इंफाल : मणिपुर में महीनों से जारी हिंसा से जन जीवन बुरी तरह प्रभावित हुआ है। भारत के इस पूर्वोत्तर राज्य में इजरायल की खोई हुई जनजाति भी तबाह हो चुकी है। इसके लोग गांव छोड़कर भागने को मजबूर हैं। सदस्यों का कहना है कि इजरायल की एक खोई हुई जनजाति महीनों की घातक जातीय हिंसा में बर्बाद हो गई है, जिसमें कम से कम एक की मौत हो गई है। उनके सभास्थलों को आग लगा दी गई है और सैकड़ों लोगों को भागने के लिए मजबूर होना पड़ा है। इस जनजाति का नाम बेनी मेनाशे है। भारत में इस जनजाति की आबादी 5,000 से अधिक है। बेनी मेनाशे समुदाय का दावा है कि वे मनश्शे जनजाति के  वंशज हैं। मनश्शे जनजाति इजरायल की खोई हुई जनजातियों में से एक है।

इसे 720 ईसा पूर्व में असीरियन विजेताओं ने भगा दिया था। बेनी मेनाशे भारत और म्यामां की सीमा पर स्थित भारतीय यहूदियों का एक समुदाय है जो दावा करते हैं कि वे इजरायल की खोई हुई जनजातियों में से एक से वंशज हैं। बेनी मेनाशे काउंसिल के अध्यक्ष लालम हैंगशिंग ने एएफपी को बताया कि मई में मणिपुर में हिंसा शुरू होने के बाद से उनके दो प्रार्थना स्थलों को तबाह कर दिया गया है और एक मौत की पुष्टि हुई है। साथ ही उनके गांव के गांव जलाकर खाक कर दिए गए हैं। ये जनजाति भी जातीय समूह से संबंधित हैं, जिसमें कुकी अल्पसंख्यक भी शामिल हैं। ये लोग मई के बाद से सशस्त्र झड़पों में मणिपुर में मैतेई समुदाय से लड़ रहे हैं, जिसमें कम से कम 120 लोग मारे गए हैं। 2011 में भारत की अंतिम जनगणना के अनुसार, मणिपुर के लगभग 28 लाख लोगों में से मुख्य रूप से ईसाई कुकी लगभग 16 प्रतिशत हैं।

वहीं बहुसंख्यक मैतेई मुख्य रूप से हिंदू हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, इस हिंसा में बेनी मेनाशे सबसे अधिक प्रभावित हुए हैं। बेंगलुरू से हैंगशिंग नेकहा कि मैं कहूंगा कि 5,000 बेनी मेनाशे में से कम से कम आधे गंभीर रूप से प्रभावित होंगे। उन्होंने कहा कि मणिपुर में उनका घर भी नष्ट हो गया है। उन्होंने कहा कि उनमें से कई आश्रयों में रह रहे हैं।उनका भविष्य खाली दिख रहा है। उन्होंने कहा कि जब कोई कुकी मरता है, तो वे यह नहीं बताते कि वह यहूदी समुदाय का है या नहीं। कुकी समुदाय ने हिंसा पीडि़तों के लिए गुरुवार को एक स्मारक का आयोजन किया और जल्द ही शवों को सामूहिक रूप से दफनाने की योजना बनाई है। इसमें बेनी मेनाशे समुदाय के ईसाई पादरियों द्वारा अंतिम संस्कार किए जाने की उम्मीद है।

हालांकि जब आईटीएलएफ ने राज्य में जातीय हिंसा में मारे गए 35 लोगों के शव बृहस्पतिवार को हाओलाई खोपी गांव में एक स्थल पर दफनाने की योजना बनाई थी, जिससे मणिपुर के कई जिलों में तनाव पैदा हो गया था। इसके बाद मणिपुर उच्च न्यायालय ने जातीय हिंसा में मारे गए कुकी-जोमी समुदाय के लोगों के शव सामूहिक रूप से दफनाए जाने के निर्धारित समय से कुछ घंटों पहले चुराचांदपुर जिले के हाओलाई खोपी गांव में प्रस्तावित अंत्येष्टि स्थल को लेकर यथास्थिति बनाए रखने का बृहस्पतिवार को आदेश दिया। बेनी मेनाशेका मौखिक इतिहास है। यह फारस, अफगानिस्तान, तिब्बत और चीन के माध्यम से सदियों से चले आ रहे पलायन के बारे में बताता है।

इसमें खतना जैसी कुछ यहूदी धार्मिक प्रथाओं का पालन भी शामिल था। भारत में 19वीं सदी के मिशनरियों द्वारा उन्हें ईसाई धर्म में परिवर्तित कर दिया गया था और बाइबिल पढ़ते समय, उन्होंने अपनी परंपराओं से कहानियों को पहचाना जिससे उन्हें विश्वास हो गया कि वे वास्तव में यहूदी धर्म से संबंधित हैं। 1990 के दशक के उत्तरार्ध से, बेनी मेनाशे के समूहों को इजरायल लाया गया जहां वे औपचारिक रूप से कनवर्ट हुए और बस गए। 65 वर्षीय हैंगशिंग, जो मणिपुर की एक राजनीतिक पार्टी कुकी पीपुल्स एलायंस के महासचिव भी हैं, उन्होंने कहा कि यह जातीय संघर्ष था और यहूदी विरोधी हमला नहीं था। उन्होंने कहा कि ज्यादातर लोग यह भी नहीं जानते कि हमारा अस्तित्व है - हमें कुकी समुदाय के हिस्से के रूप में देखा जाता है। आप इसे कोलैटरल डैमेज कह सकते हैं। लेकिन उन्होंने कहा कि कुछ भीड़ ने विशेष रूप से उनके खिलाफ नारे लगाए थे। उन्होंने कहा कि कुछ नारे कहते हैं कि हम यहां के नहीं हैं, हम खोए हुए यहूदी हैं जिन्हें इजरायल वापस जाना चाहिए।