नई दिल्ली: संसद के विशेष सत्र की घोषणा के एक दिन बाद, सरकार ने शुक्रवार को एक राष्ट्र, एक चुनावकी संभावना तलाशने के लिए पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद की अध्यक्षता में एक समिति का गठन किया। इससे लोकसभा चुनाव समय पूर्व कराने की संभावनाओं के द्वार खुल गए हैं ताकि इन्हें कई राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनावों के साथ ही संपन्न कराया जा सके। इस कदम ने विपक्षी दलों के गठबंधन 'इंडिया' को सकते में डाल दिया, जिसकी शुक्रवार को मुंबई में बैठक हुई है। विपक्षी गठबंधन ने इस फैसले की निंदा की और इसे देश के संघीय ढांचे के लिए खतरा करार दिया। इस बीच, 18-22 सितंबर तक आयोजित होने वाले संसद के विशेष सत्र के दौरान सांसदों की सामूहिक तस्वीर लेने की भी व्यवस्था की जा रही है, जिससे अटकलों का एक और दौर शुरू हो गया है क्योंकि ऐसी तस्वीर आम तौर पर संसद के कार्यकाल की शुरुआत या अंत में ली जाती है।
सूत्रों ने शुक्रवार को कहा कि कोविंद यह अध्ययन करेंगे कि देश में कैसे एक साथ लोकसभा और राज्य विधानसभा चुनाव कराए जा सकते हैं, जैसा कि 1967 तक होता था। सूत्रों ने कहा कि उम्मीद है कि वह विशेषज्ञों से बात करेंगे और विभिन्न राजनीतिक दलों के नेताओं से भी सलाह ले सकते हैं। हालांकि सरकार ने सत्र का एजेंडा जारी नहीं किया है, लेकिन उसने इन संकेतों के बीच यह कदम उठाया है कि विशेष सत्र 17वीं लोकसभा की आखिरी बैठक हो सकती है और आम चुनाव पहले कराए जा सकते हैं। साल 2014 में सत्ता में आने के बाद से, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बार-बार चुनाव होने से पडऩे वाले वित्तीय बोझ और चुनाव के दौरान विकास कार्य रुकने का हवाला देते हुए, स्थानीय निकायों समेत देश में सभी चुनाव एक साथ कराने के विचार के प्रबल समर्थक रहे हैं। कोविंद ने भी मोदी के विचार को दोहराया था और 2017 में राष्ट्रपति बनने के बाद इस विचार के प्रति अपना समर्थन व्यक्त किया था। उन्होंने 2018 में संसद को संबोधित करते हुए कहा था कि बार-बार चुनाव होने से न केवल मानव संसाधनों पर भारी बोझ पड़ता है बल्कि आदर्श आचार संहिता लागू होने के कारण विकास प्रक्रिया भी बाधित होती है।
मोदी की तरह, उन्होंने इस विचार पर निरंतर परिचर्चा का आह्वान किया था और उम्मीद जताई थी कि सभी राजनीतिक दल इस मुद्दे पर आम सहमति पर पहुंचेंगे। मोदी सरकार का दूसरा कार्यकाल खत्म होने जा रहा है, ऐसे में सरकार का विचार है कि अब इस मुद्दे को लंबा नहीं खींचा जा सकता। सरकार के हालिया कदमों ने आम चुनाव को कुछ राज्यों में चुनावों के साथ समयपूर्व कराने की संभावना को जन्म दिया है। नवंबर-दिसंबर में पांच राज्यों- मिजोरम, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, तेलंगाना और राजस्थान में विधानसभा चुनाव होने हैं और इसके बाद अगले साल मई-जून में लोकसभा चुनाव होने हैं। आंध्र प्रदेश, ओडिशा, सिक्किम और अरुणाचल प्रदेश विधानसभाओं में लोकसभा चुनाव के साथ विधानसभा चुनाव होने हैं।
भाजपा के आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री जगन मोहन रेड्डी और ओडिशा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक के साथ अच्छे संबंध हैं, भले ही वे औपचारिक रूप से भाजपा नीत राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) का हिस्सा नहीं हैं। अरुणाचल प्रदेश में भाजपा सत्ता में है जबकि सिक्किम में सहयोगी दल का शासन है। महाराष्ट्र और हरियाणा में भाजपा सहयोगियों के साथ सत्ता में है। इन दोनों राज्यों और झामुमो-कांग्रेस शासित झारखंड में लोकसभा चुनाव के बाद विधानसभा चुनाव होने हैं। अतीत में दो विधि आयोगों ने एक साथ चुनाव की आवश्यकता का समर्थन किया था। उन्होंने इसे सफल बनाने के लिए आवश्यक व्यापक संवैधानिक तंत्र की ओर इशारा किया था। निर्वाचन आयोग ने संविधान में संशोधन का प्रस्ताव करते हुए कहा था कि लोकसभा का कार्यकाल आम तौर पर एक विशेष तारीख को शुरू और समाप्त होगा (न कि उस तारीख को जब वह अपनी पहली बैठक की तारीख से पांच साल पूरे करेगी)। कानून और कार्मिक विभाग से संबंधित संसदीय स्थायी समिति ने दिसंबर 2015 में 'लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के लिए एक साथ चुनाव कराने की व्यवहार्यता' पर एक रिपोर्ट पेश की थी।
उसने इस मुद्दे पर निर्वाचन आयोग द्वारा दिए गए सुझावों का हवाला दिया था। वहीं विपक्षी नेताओं ने आरोप लगाया कि 'इंडिया' गठबंधन की बैठक ने सत्तारूढ़ भाजपा को परेशान कर दिया है और सरकार को समिति गठित करने का निर्णय लेने के लिए मजबूर किया है। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खडग़े ने सरकार के इस कदम को ध्यान भटकाने वाला बताया। खडग़े ने 'एक्स' (पूर्व में ट्विटर) पर लिखा कि सत्तापक्ष लोगों का ध्यान भटकाने की कितनी भी कोशिश क्यों न कर ले, भारत के नागरिकों के साथ अब और विश्वासघात नहीं किया जा सकेगा। आम आदमी पार्टी की मुख्य प्रवक्ता प्रियंका कक्कड़ ने कहा कि यह 'इंडिया' गठबंधन के तहत विपक्षी दलों की एकता देखने के बाद सत्तारूढ़ दल में घबराहट को दर्शाता है।