पूर्वांचल प्रहरी डेस्क संवाददाता गुवाहाटी : राजनीतिक बैठकें आयोजित करने के लिए फीस निर्धारण को लेकर राज्य में घमासान मचा हुआ है। विपक्षी राजनीतिक दल, जातीय संगठन सभी में सरकार के फैसले के खिलाफ गुस्सा है। उन्होंने सरकार से ऐसे अडिय़ल फैसले को वापस लेने की मांग की। विभिन्न राजनीतिक दलों और गैर राजनीतिक संगठनों के नेतृत्व द्वारा इसका कड़ा विरोध किए जाने के बाद सीएम ने अपना मुंह खोला है। सीएम ने ट्विटर पर स्पष्टीकरण जारी करते हुए कहा कि यह एक प्रोसेसिंग शुल्क है, कर नहीं। उन्होंने कहा कि रैलियों और राजनीतिक बैठकों के लिए निर्धारित आवेदन शुल्क कर नहीं है। सरकार ने पारंपरिक सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित करने के लिए 50 करोड़ रुपए आवंटित किए हैं। प्रत्येक बिहू समिति को पहले ही 1,50,000 रुपए का भुगतान किया जा चुका है।
ऐसे में मुझे नहीं लगता कि कोई भी समिति परमिट शुल्क का भुगतान करने के लिए हमारी आलोचना करेगी। सरकार का एक वादा हमारे पारंपरिक सांस्कृतिक कार्यक्रमों को प्रोत्साहित करना भी था। सरकार ने इस साल से 3,000 रास समितियों को 25,000 रुपए देने का फैसला किया है। मुझे आशा है कि हमारे प्रयास रास समितियों के लिए सहायक और प्रेरणादायक होंगे। रैलियों रखने को ध्यान में रखकर सोच-विचारकर कुछ उपायों की भी घोषणा की है। ये उपाय एहतियाती हैं। ये उपाय सोच-विचार और लक्ष्य के हिसाब से किए गए हैं। उल्लेखनीय है आरबीआई ने पिछले सप्ताह बैंकों और गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों (एनबीएफसी) के लिए व्यक्तिगत और क्रेडिट कार्ड कर्ज जैसे असुरक्षित माने जाने वाले ऋण के नियमों को कड़ा किया था।
संशोधित मानदंड में जोखिम भार में 25 प्रतिशत की वृद्धि की गई है। उच्च जोखिम भार का मतलब है कि व्यक्तिगत कर्ज के मामले में बैंकों को अलग से ज्यादा राशि का प्रावधान करना होगा। इससे बैंक किसी प्रकार के दबाव की स्थिति में उससे निपटने में ज्यादा सक्षम होंगे। साथ ही इस कदम से लोगों के लिए व्यक्तिगत कर्ज और क्रेडिट कार्ड के जरिए ऋण लेना महंगा होगा। दास ने कहा कि आरबीआई ने आवास और वाहन खरीद के अलावा छोटे कारोबारियों द्वारा लिए जाने वाले कर्जों को इससे अलग रखा है। इसका कारण इसके जरिए जो वृद्धि हो रही है, उसे बनाए रखना है। उन्होंने यह भी कहा कि इस खंड में उन्हें दबाव बनने की स्थिति नहीं दिख रही।