गुवाहाटी : स्वतंत्र असम के सपने के साथ सशस्त्र संघर्ष का रास्ता चुनने के पश्चात वार्ता की मेज पर लौटने के 12 साल बाद विद्रोही समूह अल्फा (वार्ता समर्थक) के साथ शुक्रवार को लंबे समय से प्रतीक्षित शांति समझौते पर हस्ताक्षर किए जाएंगे। लगभग चालीस वर्षों के संघर्ष के अंतिम परिणाम स्वरूप इस ऐतिहासिक समझौते से असम के लोगों को क्या मिलेगा इसको लेकर अटकलें लगाई जा रही हैं। अल्फा नेता अनूप चेतिया ने कहा कि सरकार और अल्फा के बीच छोड़ो ओर जोड़ो के माध्यम से समझौते को अंतिम रूप दिया गया है। समझौते में कुछ ऐसे मुद्दे भी शामिल हैं जो सरकार नहीं चाहती। वहीं अल्फा की ओर से अनुरोधित कुछ मुद्दे भी हैं जिन्हें समझौते में शामिल नहीं किया गया है। चेतिया के मुताबिक समझौते को अंजाम तक पहुंचाने के लिए दोनों पक्षों को कुछ  कुर्बानियां देनी पड़ीं। अल्फा नेतृत्व का दावा है कि अल्फा समझौता एक व्यापक समझौता होगा। राज्य के समग्र विकास के साथ-साथ असम के मूल निवासियों के राजनीतिक अधिकारों के लिए एक व्यापक वित्तीय पैकेज होगा। विधानसभा और लोकसभा में निर्वाचन क्षेत्र आरक्षण का एक विशिष्ट समीकरण प्रदान किया जाएगा। सेवानिवृत्त न्यायमूर्ति विप्लव शर्मा आयोग के परामर्श असम समझौते के अनुच्छेद 6 यानी असमिया की संवैधानिक सुरक्षा पर दिशानिर्देश प्रदान करेगा। वार्ता समर्थक अल्फा नेताओं और कैडरों के मामलों को वापस लेकर उनके पुनर्वास का प्रावधान किया जाएगा।

यहा उल्लेखनीय है कि इस ऐतिहासिक समझौते के गवाह बनने के लिए अल्फा का 16 सदस्यीय प्रतिनिधिमंडल इस समय दिल्ली में उपस्थित है। सोमवार को संघ के महासचिव अनुप चेतिया और विदेश सचिव शशधर चौधरी के दिल्ली पहुंचने के बाद बुधवार को विद्रोही समूह के अध्यक्ष अरविंद राजखोवा, उपाध्यक्ष प्रदीप गोगोई, उप सेना प्रमुख राजू बरुवा, वित्त सचिव चित्रवन हजारिका, प्रचार सचिव मिथिंगा दैमारी और सांस्कृतिक सचिव प्रणति डेका दिल्ली पहुंचे। उनके साथ संगठन के 8 कार्यकारी पदाधिकारी भी हैं। शुक्रवार को शांति समझौते पर हस्ताक्षर के दौरान अल्फा का 16 सदस्यीय प्रतिनिधिमंडल नॉर्थ ब्लॉक स्थित केंद्रीय गृह मंत्रालय कार्यालय में उपस्थित रहेगा। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और मुख्यमंत्री डॉ. हिमंत विश्व शर्मा भी मौजूद रहेंगे। वहीं दूसरी ओर अल्फा के निमंत्रण पर ऐतिहासिक शांति समझौते के गवाह बनने के लिए राज्य के स्वदेशी जातीय समूहों के 14 गणमान्य व्यक्ति भी समारोह में शामिल होंगे। अल्फा और केंद्र सरकार के बीच 29 दिसंबर को नई दिल्ली में होने वाले प्रस्तावित शांति समझौते की प्रक्रिया पर राज्यव्यापी जागरूक लोगों के साथ विभिन्न दल-संगठनों के बीच स्वाभाविक रूप से चिंता भी है।

पता चला है कि शांति समझौते पर 29 दिसंबर की शाम को नई दिल्ली में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की मौजूदगी में शांति समझौते पर हस्ताक्षर होने वाले हैं। इस दौरान अखिल असम छात्र संघ, असम जातीयतावादी युवा छात्र परिषद सहित जातीयतावादी विचारधारा में विश्वास रखने वाले दल-संगठनों ने वार्ता समर्थक अल्फा गुट के नेतृत्व से इस पर नजर रखने के लिए आह्वान किया ताकि यह शांति समझैता किसी भी तरह से दिखावा न बने।  दूसरी ओर असम में विपक्षी दलों और नागरिक संगठनों को उल्फा समर्थक वार्ता गुट के साथ प्रस्तावित समझौते की प्रासंगिकता को लेकर संशय है। समझौते पर 29 दिसंबर को नई दिल्ली में हस्ताक्षर होने वाले हैं। लेकिन ऐसी चिंता है कि राज्य में तब तक शांति नहीं आएगी जब तक उल्फा (इंडिपेंट) चर्चा में भाग नहीं लेता। आलोचकों की दलील है कि यह समझौता केंद्र और राज्य दोनों स्तरों पर सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) का चुनावी एजेंडा है। कांग्रेस विधायक दल के नेता देबब्रत सैकिया ने कहा कि लंबे समय से कायम मुद्दे का स्थायी समाधान ‘तभी संभव हो सकेगा जब संगठन के सभी धड़े बातचीत के लिए आएंगे।

मैं मुख्यमंत्री हिमंत विश्व शर्मा से यह सुनिश्चित करने का अनुरोध करता हूं कि परेश बरुवा नीत उल्फा (आई) को भी बातचीत की मेज पर लाया जाए। उन्होंने कहा कि हम चर्चा का स्वागत करते हैं और लंबे समय से कायम विवाद के हल की उम्मीद करते हैं। यह कोई नयी बात नहीं है क्योंकि यह पहल 2011 में कांग्रेस शासन के दौरान की गई थी, लेकिन 2014 में सत्ता में आने के बाद, भाजपा ने शांति प्रक्रिया को आगे बढ़ाने के लिए कुछ नहीं किया। कांग्रेस नेता ने कहा कि इसलिए समझौते पर हस्ताक्षर के समय को लेकर असम के लोगों के मन में संदेह है। हमें संदेह है कि यह 2024 में लोकसभा चुनाव से पहले सिर्फ एक चुनावी हथकंडा हो सकता है। उन्होंने आरोप लगाया कि एक तरफ निर्दोष नागरिकों को उग्रवादी बताकर गिरफ्तार किया जा रहा है और उन्हें मुठभेड़ों में घायल किया जा रहा है वहीं दूसरी ओर नयी दिल्ली में शांति वार्ता हो रही है और यह संशयपूर्ण है कि ऐसी स्थिति में स्थायी शांति हो सकेगी। रायजोर दल के प्रमुख एवं विधायक अखिल गोगोई ने कहा कि शांति वार्ता और समझौते का तभी स्वागत किया जा सकता है जब संविधान के तहत राज्य को अधिक शक्ति या विशेष दर्जा प्रदान किया जाए ताकि राज्य को आर्थिक और राजनीतिक अधिकार के साथ-साथ प्राकृतिक संसाधनों पर अधिक नियंत्रण मिल सके। गोगोई ने कहा कि यदि सरकार असम और भारत में स्थायी शांति चाहती है तो केंद्र को इस मुद्दे को सुलझाने के लिए अल्फा (आई) के साथ जल्द से जल्द बातचीत करनी चाहिए।