नई दिल्ली: बिहार की राजनीति में सियासी उठापटक जारी है। हाल के दिनों में हुए घटनाक्रमों और सामने आए बयानों से अटकलें लग रही हैं कि बिहार में जदयू एक बार फिर एनडीए में शामिल होने को तैयार है। हालांकि, यह पहली बार नहीं है जब नीतीश कुमार महागठबंधन को छोड़कर भाजपा के नेतृत्व वाले एनडीए गठबंधन के साथ आ रहे हैं। इससे पहले तीन बार जदयू ने साथी बदला है लेकिन दिलचस्प है कि नीतीश कुमार हर बार मुख्यमंत्री रहे। भले उनकी पार्टी के विधायकों की संख्या उनके सहयोगी से कम रही हो। जनता दल से अलग होकर 1994 में जॉर्ज फर्नांडिस और नीतीश कुमार ने समता पार्टी की शुरुआत की। 1996 के लोकसभा चुनावों में समता पार्टी ने भाजपा के साथ गठबंधन किया। समता पार्टी को इस लोकसभा चुनाव में आठ सीटों पर जीत मिली। इनमें से छह बिहार में और एक-एक उत्तर प्रदेश  और ओडिशा में थी। 1998 के आम चुनावों में भारतीय जनता पार्टी के साथ गठबंधन में समता पार्टी ने 12 सीटें जीतीं। इनमें बिहार से 10 और उत्तर प्रदेश से दो सीटें शामिल थीं। मार्च 2000 में नीतीश कुमार को बिहार के मुख्यमंत्री पद के लिए एनडीए का नेता चुना गया। उन्होंने केंद्र में अटल बिहारी वाजपेयी के कहने पर पहली बार बिहार के मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली। 324 सदस्यीय सदन में एनडीए और सहयोगी दलों के पास 151 विधायक थे जबकि लालू प्रसाद यादव के पास 159 विधायक थे। दोनों गठबंधन बहुमत के आंकड़े यानी 163 से कम थे। सदन में बहुमत साबित नहीं कर पाने के चलते नीतीश ने इस्तीफा दे दिया। महज सात दिन बाद ही वह सत्ता से बाहर हो गए। 2003 नीतीश कुमार के नेतृत्व वाली समता पार्टी का पहले ही कई टुकड़ों में बंट चुके जनता दल में विलय हो गया। विलय की गई इकाई को जनता दल (यूनाइटेड) नाम मिला और राज्य में एक नई पार्टी अस्तित्व में आई। 2005 में बिहार में विधानसभा चुनाव हुए। इस चुनाव के लिए पहली बार भाजपा और जदयू को चुनावी सफलता हासिल की। 243 सदस्यीय विधानसभा में इस चुनाव में भाजपा ने 55 सीटें जबकि जदयू ने 88 सीटें जीतीं। राजद के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार को हराने के बाद जदयू नेता नीतीश कुमार बिहार के मुख्यमंत्री बने। 2009 के लोकसभा चुनाव में भी गठबंधन को बड़ी सफलता मिली। 40 लोकसभा सीटों वाले बिहार में जदयू 25 और भाजपा 15 सीटों पर लड़ी। इनमें से 32 सीटों पर इस गठबंधन को सफलता मिली। भाजपा के 15 में से 12 उम्मीदवार जीतने में सफल रहे। वहीं, जदयू के 25 में से 20 उम्मीदवार जीतकर लोकसभा पहुंचे। साल 2010 में बिहार विधानसभा चुनाव हुए। भाजपा-जदयू ने एक बार फिर एक साथ चुनाव लड़ा और जबरदस्त सफलता हासिल की। 243 सदस्यीय बिहार विधानसभा में भाजपा-जदयू गठबंधन ने 206 सीटों पर जीत दर्ज की। जदयू ने 115 सीटें तो भाजपा ने 91 सीटें जीतीं। इस जीत के साथ नीतीश एक बार फिर राज्य के मुख्यमंत्री बने। लालू यादव की पार्टी राजद को महज 22 सीट से संतोष करना पड़ा। जबकि, केंद्र की सत्ता में बैठी कांग्रेस चार सीटों पर सिमट गई। 2014 के लोकसभा चुनाव से पहले देश की राजनीति में बड़ा बदलाव हुआ। दरअसल, 2014 आम चुनाव के लिए भाजपा ने अपनी चुनाव अभियान समिति का अध्यक्ष गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को बना दिया। इस फैसले के विरोध में नीतीश कुमार ने बिहार में भाजपा के साथ 17 साल पुराना गठबंधन तोड़ दिया। जदयू अध्यक्ष शरद यादव और बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने जून 2013 को एक संवाददाता सम्मेलन में गठबंधन खत्म करने की घोषणा की।  भाजपा से गठबंधन तोडऩे के बाद भी नीतीश की पार्टी सत्ता में बनी रही। उनकी पार्टी की सरकार को राजद और कांग्रेस ने बाहर से समर्थन दिया। लोकसभा चुनाव में इन दलों के साथ मिलकर नीतीश ने चुनाव नहीं लड़ा। उनकी पार्टी राज्य की 40 में से 38 सीटों पर चुनाव लड़ी, लेकिन जीत केवल दो सीटों पर मिली। वहीं, भाजपा ने लोजपा, रालोसपा जैसे दलों के साथ गठबंधन में चुनाव लड़ा। यह गठबंधन 31 सीटें जीतने में सफल रहा। इसमें भाजपा ने 22 सीटें, लोजपा ने छह और उपेंद्र कुशवाहा वाली राष्ट्रीय लोक समता पार्टी ने तीन सीटें जीतीं। 2014 में भाजपा के प्रचंड बहुमत से चुनाव जीतने के बाद नीतीश ने जेडीयू की हार की जिम्मेदारी ली और जीतम राम मांझी को सीएम नियुक्त करते हुए मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया। मई 2014 में लालू यादव की पार्टी राजद और कांग्रेस ने जदयू का समर्थन किया और विधानसभा में बहुमत परीक्षण में सफल रहे। इस तरह से जदयू, कांग्रेस और राजद ने महागठबंधन का गठन किया। 2014 में महागठबंधन बनाने के बाद 2015 में बिहार विधानसभा चुनाव हुए। इस चुनाव में राज्य में महागठबंधन के तहत राजद ने 80 सीटों पर, जदयू ने 71 सीटों पर और कांग्रेस ने 27 सीटों पर जीत दर्ज की। उधर भाजपा महज 53 सीटों पर ही जीत दर्ज कर सकी। इसके साथ नीतीश कुमार फिर बिहार के मुख्यमंत्री बने और तेजस्वी यादव को उपमुख्यमंत्री चुना गया। गठबंधन में राजद के महत्व से असंतुष्ट नीतीश 2016 में फिर से सुर्खियों में आये। एक बार फिर उनका झुकाव भाजपा की नोटबंदी और जीएसटी संबंधी नीतियों की ओर हुआ। जबकि गठबंधन में शामिल दलों ने इसका विरोध किया। इसी बीच सीबीआई द्वारा लालू यादव और उनके रिश्तेदारों के खिलाफ भ्रष्टाचार के मामले दर्ज करने के बाद उनके गठबंधन से निकलने का रास्ता बन गया। नीतीश ने गठबंधन में शामिल तेजस्वी यादव का इस्तीफा मांग लिया, जिनका नाम सीबीआई के आरोपपत्र में आया था। हालांकि, लालू यादव ने इनकार कर दिया और नीतीश अपनी सियासी यात्रा में एक बार फिर भाजपा की ओर मुड़ गए। जुलाई 2017 में नीतीश कुमार ने 20 महीने पुराने महागठबंधन वाली सरकार को समाप्त करते हुए, बिहार के मुख्यमंत्री के रूप में अपना इस्तीफा दे दिया। 27 जुलाई 2017 को उन्होंने फिर से भाजपा के समर्थन से बिहार के मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। 2019 के लोकसभा चुनाव में भी जदयू और भाजपा साथ लड़े। बिहार की कुल 40 सीटों में से एनडीए ने 39 सीटें जीत लीं। जहां भाजपा के 17 उम्मीदवार जीते तो जदयू के 16 प्रत्याशी विजयी हुए। इसके अलावा लोजपा ने छह सीटें जीतीं। 2020 में बिहार विधानसभा चुनाव में राज्य में भाजपा जदयू ने एक साथ चुनाव लड़ा। इस चुनाव में भाजपा ने 74 सीटों पर और जदयू ने 43 सीटों पर जीत दर्ज की। इसके साथ ही जीतन राम मांझी की हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा के साथ मिलकर सरकार बनी जिसके मुखिया नीतीश कुमार बने। वहीं, भाजपा की तरफ से तारकिशोर प्रसाद और रेणू देवी के रूप में दो उपमुख्यमंत्री बनाए गए।  नीतीश ने बिहार में दो डिप्टी सीएम की नियुक्ति पर असंतोष के बीच भाजपा के राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एनआरसी) पर आपत्ति जताई। कई मतभेदों के बाद 9 अगस्त 2022 को नीतीश कुमार ने घोषणा की कि बिहार विधानसभा में भाजपा के साथ जदयू का गठबंधन खत्म हो गया है। उन्होंने दावा किया कि बिहार में नई सरकार, राजद और कांग्रेस सहित नौ पार्टियों का गठबंधन महागठगंधन 2.0 होगी। जदयू भाजपा से नाता तोड़कर राजद के साथ मिल गई और नीतीश फिर से बिहार के मुख्यमंत्री बन गए।