केंद्र सरकार ने राजस्व सचिव संजय मल्होत्रा को आरबीआई का गवर्नर नियुक्त किया है। पूर्व गवर्नर शक्तिकांत दास का कार्यकाल समाप्त हो चुका है और नए गवर्नर ने अपना कार्यभार संभाल लिया है। नए गवर्नर मल्होत्रा भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान कानपुर से इंजीनियरिंग में स्नातक हैं और उन्होंने प्रिंसटन विश्वविद्यालय से लोक नीति में स्नातकोत्तर की डिग्री ली है। वह भारतीय प्रशासनिक सेवा के 1990 बैच के अधिकारी हैं। उन्होंने भारत सरकार के वित्त मंत्रालय में सचिव (राजस्व) के रूप में कार्य किया। अपने पिछले कार्यभार में उन्होंने भारत सरकार के वित्त मंत्रालय के तहत वित्तीय सेवा विभाग में सचिव का पद भी संभाला था। उससे पहले उन्होंने ग्रामीण विद्युतीकरण निगम के अध्यक्ष और प्रबंध निदेशक और भारत गणराज्य सरकार के बिजली मंत्रालय में अतिरिक्त सचिव के रूप में कार्य किया है। वे राजस्थान सरकार में विभिन्न पदों पर कार्य कर चुके हैं। मल्होत्रा का जन्म राजस्थान के बीकानेर में हुआ था, उन्होंने भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान, कानपुर से कंप्यूटर विज्ञान में बैचलर ऑफ टेक्नोलॉजी की डिग्री हासिल की। उल्लेखनीय है कि पूर्व गवर्नर शक्तिकांत दास के कार्यकाल में सरकार और रिजर्व बैंक के बीच किसी तरह का मतभेद नजर नहीं आया। फिलहाल बजट निर्माण की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है। विगत छह वर्षों का दास का कार्यकाल देश की अर्थव्यवस्था और रिजर्व बैंक दोनों के लिए चुनौतीपूर्ण रहा और इसकी प्रमुख वजह रही कोविड-19 महामारी। रिजर्व बैंक को आपातकालीन उपाय अपनाने पड़े और यह भी सुनिश्चित करना पड़ा कि वित्तीय व्यवस्था मजबूत बनी रहे। रिजर्व बैंक ने महामारी के दौरान और बाद में भी कई कदम उठाए, लेकिन नीतिगत और वित्तीय स्थिरता के लिहाज से दो क्षेत्र ऐसे रहे जिन पर चर्चा की जा सकती है। पहली बात तो यह कि रिजर्व बैंक मुद्रास्फीति को लक्षित करने वाला केंद्रीय बैंक है। हालांकि नीतिगत ब्याज दर तय करने की जिम्मेदारी अब छह सदस्यीय मौद्रिक नीति समिति (एमपीसी) की भी है, लेकिन किसी भी गवर्नर का कार्यकाल आंशिक तौर पर इस आधार पर भी आंका जाएगा कि उसने मुद्रास्फीति का प्रबंधन किस प्रकार किया। इस संदर्भ में यह तर्क  उचित है कि पिछले कुछ वर्षों में रिजर्व बैंक ने मुद्रास्फीति की प्रवृत्ति को कम करके आंका। हालांकि एक बार जब उसने नीतिगत सख्ती आरंभ की तो उसे समय से पहले वापस न लेकर अच्छा किया। एमपीसी की इच्छा है कि इंतजार करके अवस्फीति की प्रक्रिया को पूरा होने दिया जाए। दूसरा है बाहरी क्षेत्र का प्रबंधन। महामारी के दौरान आरंभिक स्थिरता के बाद जब बड़ी वैश्विक केंद्रीय बैंकों ने व्यवस्था में नकदी डालना शुरू किया और नीतिगत दरों को शून्य के करीब ले गए तो भारत में भी पूंजी की भारी आवक हुई। रिजर्व बैंक ने अतिरिक्त प्रवाह की खपत करके अच्छा किया। भारी भरकम विदेशी मुद्रा भंडार ने 2022 में उस समय मदद की जब अमरीकी फेडरल रिजर्व सहित केंद्रीय बैंकों ने मुद्रास्फीति से निपटने के लिए नीतिगत ब्याज दर में इजाफा कर दिया। वैश्विक मुद्रा बाजारों में भी भारी अस्थिरता देखने को मिली। हालांकि भारतीय रुपए में इस अवधि में काफी गिरावट आई लेकिन उसका असर सीमित रहा, क्योंकि रिजर्व बैंक ने समय से हस्तक्षेप किया। बाहरी मोर्चे पर स्थिरता बनाए रखना बीते कुछ सालों में रिजर्व बैंक का एक प्रमुख काम रहा है। कुछ अर्थशास्त्री कह चुके हैं कि रुपया बहुत स्थिर है। यकीनन इसका अधिमूल्यन रहा है जो कारोबार योग्य क्षेत्रों में इसकी प्रतिस्पर्धी क्षमता पर असर डाल सकता है। इस संदर्भ में मल्होत्रा के सामने यह चुनौती होगी कि वह सुनिश्चित करें कि मुद्रा बाजार हस्तक्षेप अतिरिक्त अस्थिरता को नियंत्रित करते-करते कारोबार योग्य क्षेत्रों पर बोझ न बन जाए। इस पहलू पर उनके कार्यकाल के आरंभ से ही नजर रहेगी। अमरीका के नवनिर्वाचित राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने जो नीतिगत बदलाव करने की बात कही है वे मुद्रा बाजार पर असर डाल सकते हैं। कुल मिलाकर नए गवर्नर से काफी उम्मीदें हैं। हमारी कामना है कि वह भारतीय अर्थव्यवस्था में स्थिरता लाने में कामयाब होंगे, इसमें कोई संदेह नहीं है।