नई सुबह का नाम है- सुशीला कार्की। नेपाल एक ऐसे ऐतिहासिक मोड़ पर खड़ा है जहां से न सिर्फ राजनीतिक दिशा तय होगी,बल्कि सामाजिक चेतना और लोकतांत्रिक मूल्यों की भी अग्निपरीक्षा होगी। हालिया हिंसा, जनाक्रोश और व्यवस्था पर अविश्वास के अंधेरे से निकलता हुआ यह हिमालयी राष्ट्र अब उम्मीद की एक नई किरण को देख रहा है- देश की पहली महिला प्रधानमंत्री सुशीला कार्की के रूप में। जनवरी की शुरुआत से ही नेपाल जल रहा था। सोशल मीडिया बैन के खिलाफ उठी आवाज़ें देखते ही देखते सत्ता की चूलें हिला देने वाले जेनजी आंदोलन में तब्दील हो गईं। युवा, जो अब सिर्फ भविष्य नहीं, बल्कि वर्तमान के निर्णायक बन चुके हैं ने सत्ता से जवाब मांगा और जवाब आया... प्रधानमंत्री ओली का इस्ती$फा और सुशीला कार्की की ताजपोशी। यह बदलाव केवल चेहरे का नहीं है, यह बदलाव सोच का है। यह उस नई राजनीति की दस्तक है, जिसमें जनता अपने नेता को खुद चुनने के लिए डिस्कॉर्ड जैसे मंचों का इस्तेमाल कर रही है। यह आंदोलन सिर्फ सड़कों पर नहीं,बल्कि डिजिटल स्पेस में भी लड़ा गया और यहीं से निकला वह नाम सुशीला कार्की जो अब पूरे नेपाल के लिए आशा का पर्याय बन चुका है। पूर्व मुख्य न्यायाधीश रहीं सुशीला कार्की कानून, संविधान और व्यवस्था की गहरी समझ रखती हैं। भ्रष्टाचार के खिलाफ उनकी पूर्व भूमिका ने उन्हें जनता की नजर में एक सख्त, लेकिन निष्पक्ष नेता बनाया है। ऐसे में उनका प्रधानमंत्री बनना सिर्फ एक राजनीतिक नियुक्ति नहीं है, यह एक सांकेतिक परिवर्तन है कि अब नेपाल उस दिशा में बढ़ रहा है जहां न्याय ही नेतृत्व है। नेपाल अभी भी हिंसा के ताजे जख्मों से उबर रहा है। संसद भंग हो चुकी है और नई सरकार के पास दो स्पष्ट जिम्मेदारियां हैं, जिसमें पहली, सामान्य स्थिति बहाल करना और दूसरी जनता का खोया विश्वास लौटाना। सेना धीरे-धीरे पीछे हट रही है, बाजार खुल रहे हैं और लोग मंदिरों में लौट रहे हैं। यह संकेत हैं कि शांति की राह फिर से खुल रही है। लेकिन यह राह लंबी है और चुनौतियां गंभीर। जनता, खासकर युवा वर्ग, अब प्रतीक्षा नहीं करना चाहता। वे परिणाम चाहते हैं,भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्रवाई,रोजगार की व्यवस्था, न्यायिक सुधार और सबसे अहम, एक ऐसा लोकतंत्र जहां उनकी आवाज़ सुनी जाए। जेनजी आंदोलन केवल व्यवस्था के खिलाफ नहीं था, यह जनता की राजनीतिक परिपक्वता का प्रमाण भी था। ऐसे में सुशीला कार्की की सबसे बड़ी परीक्षा यही होगी कि वे इस जनसंपर्क, इस युवा ऊर्जा को राजनीतिक भागीदारी में बदल सकें। नेपाल ने अपने सबसे कठिन दौर में एक महिला को नेतृत्व सौंपा है यह इतिहास है। लेकिन यह इतिहास तब तक अर्थहीन है जब तक यह भविष्य की गारंटी न बन जाए। सुशीला कार्की न सिर्फ प्रधानमंत्री हैं, बल्कि वे उस आत्मा की प्रतीक बन गई हैं जो न्याय, संवैधानिकता और जनसरोकार की बुनियाद पर एक नया राष्ट्र खड़ा करना चाहती है। अब देखना यह है कि क्या यह नेतृत्व सिर्फ प्रतीकात्मक सिद्ध होगा या वास्तविक बदलाव की नींव बनेगा। नेपाल की अगली सुबह कैसी होगी इसका उत्तर आने वाले कुछ महीनों में मिल जाएगा। पर इतना तय है, कि यह सुबह सुशीला कार्की के नाम की है। कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि सुशीला कार्की के सिर पर अहम जिम्मेदारी है। उन्हें नेपाल में शांति और सौहार्द की सत्ता कायम करनी है। छात्रों और युवाओं के लिए शिक्षा और रोजगार की भी व्यवस्था करनी है। आंदोलन के कारण जो नुकसान हुआ है,उसकी भी भरपाई करनी है ताकि राष्ट्र को एक बार फिर सुचारु रुप से चलाया जा सके। दूसरी ओर विभिन्न विचार और समझ रखने वाले लोगों को नेपाल के विकास के लिए एक मंच पर लाकर उन्हें जोड़ना है। अब देखना है नेपाल की नई उम्मीद सुशीला कार्की नेपालवासियों की उम्मीदों और आकांक्षाओं पर कितनी खड़ा उतरती हैं।