लेह-लद्दाख को भारत का शांत, शीतल और आध्यात्मिक स्वरूप कहा जाता है। यह फिलहाल असामान्य परिस्थितियों से गुजर रहा है। यह क्षेत्र अब तक पर्यटन, संस्कृृति और सामरिक महत्व के कारण जाना जाता था, वहां हाल ही में आगजनी, पत्थरबाजी, सरकारी संपत्तियों को नुकसान और उत्तेजक नारों के बीच जो माहौल बना, उसने समूचे देश को चौंका दिया है। लद्दाख की भौगोलिक स्थिति विशिष्ट है- यह क्षेत्र 2250 मीटर से लेकर 7742 मीटर तक की ऊंचाई पर स्थित है और चीन के साथ वास्तविक नियंत्रण रेखा साझा करता है। बीते वर्षों में भारत-चीन संबंधों के तनावपूर्ण दौर में लद्दाख, खासकर गलवान घाटी अंतर्राष्ट्रीय चर्चा में रहा। लेकिन इस बार चर्चा का कारण न कोई सीमा विवाद है और न ही विदेशी घुसपैठ- बल्कि भीतर से उठता असंतोष है, जिसकी परिणति हिंसा में हुई। 18 सितंबर को शुरू हुआ यह आंदोलन एक समय सांकेतिक विरोध और आमरण अनशन तक सीमित था, लेकिन जल्द ही यह रूप बदल कर हिंसक प्रदर्शन में तब्दील हो गया। 4 से 5 लोगों की मौत और 70 से अधिक घायल, इंटरनेट सेवा पर रोक, कर्फ्यू की घोषणा और स्थानीय भाजपा कार्यालय में आगजनी- ये सब उस इलाके में असामान्य हैं, जिसे अब तक भारत का शांतिपूर्ण कोना माना जाता रहा है। हिंसा के पीछे राजनीतिक साजिश की भी चर्चा हो रही है। भाजपा ने स्थानीय कांग्रेस पार्षद पर आरोप लगाया है, वहीं आंदोलन का नेतृत्व कर रहे सोनम वांगचुक, जो नवाचार, शिक्षा सुधार और जलवायु परिवर्तन के क्षेत्र में प्रसिद्ध हैं ने इस हिंसक रुख से स्वयं को अलग कर लिया और अपना अनशन समाप्त कर शांति की अपील की। लद्दाख के युवाओं और स्थानीय संगठनों की मुख्य मांग है कि लद्दाख को पूर्ण राज्य का दर्जा दिया जाए और भारतीय संविधान की छठी अनुसूची में शामिल किया जाए, जिससे जनजातीय समुदायों के अधिकार संरक्षित रह सकें। उनका तर्क  है कि 2019 में जब लद्दाख को जम्मू-कश्मीर से अलग कर केंद्रशासित क्षेत्र बनाया गया, तब आश्वासन दिये गए थे जो अब तक अधूरे हैं। यह भी सत्य है कि लद्दाख दशकों से जम्मू-कश्मीर की छाया में दबा रहा और अलग पहचान की मांग वहां नई नहीं है, लेकिन यह भी उतना ही सत्य है कि लद्दाख की जनसंख्या मात्र 2.75 लाख और संपूर्ण क्षेत्रफल 59,146 वर्ग कि.मी. है- यानी एक बड़े जिले के बराबर। ऐसे में पूर्ण राज्य का दर्जा व्यावहारिक और आर्थिक दृष्टि से कितना तर्कसंगत है, यह एक अहम सवाल है। सरकार के लिए यह स्थिति एक राजनीतिक परीक्षा है। एक तरफ राष्ट्र की एकता और अखंडता का सवाल है, वहीं दूसरी तरफ स्थानीय आकांक्षाओं और क्षेत्रीय अस्मिता का सम्मान भी आवश्यक है। यह चिंता भी स्पष्ट है कि अगर लद्दाख को राज्य का दर्जा दिया जाता है तो जम्मू-कश्मीर और दिल्ली जैसे अन्य केंद्रशासित क्षेत्रों में भी समान मांगें और आंदोलन खड़े हो सकते हैं। सूत्रों के अनुसार केंद्र सरकार सोनम वांगचुक को वार्ता से बाहर रखना चाहती है, क्योंकि उन्हें अवरोधक के रूप में देखा जा रहा है। दूसरी ओर, वांगचुक का कहना है कि गृह मंत्रालय से बातचीत की उम्मीद है और लोगों की नाराजगी मुख्यत: अधूरे वादों और भविष्य की अनिश्चितताओं को लेकर है। लद्दाख के हालिया घटनाक्रम से यह स्पष्ट हो गया है कि भले ही क्षेत्र छोटा हो, लेकिन वहां के लोगों की आकांक्षाएं गहरी हैं। हिंसक आंदोलन किसी भी रूप में जायज नहीं हो सकते, लेकिन राजनीतिक संवाद और संवेदनशीलता के बिना असंतोष और भी बढ़ सकता है। यदि वाजिब मांगें हों तो संविधान के दायरे में रहकर उन पर विचार होना चाहिए और यदि मांगें अव्यावहारिक हों तो स्पष्टता और पारदर्शिता के साथ संवाद कर उन्हें समझाया जाना चाहिए। लद्दाख को भारत की सीमाओं की रक्षा करने वाला क्षेत्र मानते हुए वहां स्थिरता, विकास और संतुलन की आवश्यकता है- राजनीतिक अस्थिरता और हिंसा की नहीं।