बचपन किसी भी समाज का सबसे कोमल, सबसे पवित्र और सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा होता है। यह वह दौर है जब एक इंसान की सोच, मानसिकता और भविष्य की नींव रखी जाती है। लेकिन जब यही बचपन असुरक्षित हो जाए तो समाज की आत्मा तक घायल हो जाती है। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) की नई रिपोर्ट इस सच्चाई को सामने लाती है कि भारत में बच्चों के खिलाफ अपराध लगातार बढ़ रहे हैं - और यह केवल एक आंकड़ा नहीं, बल्कि समाज की नैतिक विफलता की निशानी है। वर्ष 2023 में बच्चों के खिलाफ कुल 1,77,335 आपराधिक मामले दर्ज हुए, जो कि 2022 की तुलना में नौ अधिक हैं। यह संख्या न केवल डरावनी है, बल्कि यह दिखाती है कि हर दिन हजारों बच्चे शोषण, हिंसा, अपहरण या यौन अपराधों का शिकार हो रहे हैं। रिपोर्ट के अनुसार बच्चों के खिलाफ होने वाले कुल अपराधों में से लगभग 45 प्रतिशत मामले अपहरण से जुड़े हैं, जबकि 38 प्रतिशत अपराध पॉक्सो अधिनियम के तहत दर्ज किए गए हैं। यह और भी चिंताजनक है कि अधिकांश मामलों में अपराधी पीड़ित बच्चे के जानने वाले ही थे। 2023 में दर्ज पॉक्सो अधिनियम के तहत मामलों में 98 प्रतिशत पीड़ित लड़कियां थीं और 39,000 से अधिक मामलों में आरोपी पीड़िता को जानता था। इनमें से भी 3,224 मामलों में आरोपी स्वयं परिवार का सदस्य था। यह तथ्य न केवल भयावह है, बल्कि इस बात की ओर इशारा करता है कि बच्चों के लिए सबसे असुरक्षित जगह कभी-कभी उनका अपना घर बन जाता है। रिपोर्ट में ऐसे भी कई मामलों का उल्लेख है जहां नाबालिग लड़कियों को जबरन विवाह या मानव तस्करी के लिए अगवा किया गया। 16,737 लड़कियों और 129 लड़कों को जबरन शादी के लिए अगवा किया गया और 1,858 मामले मानव तस्करी से जुड़े थे। घरेलू हिंसा, गरीबी, बेरोजगारी, सामाजिक दबाव और परिवारों का विघटन ऐसे अपराधों के पीछे प्रमुख कारण माने जा रहे हैं। एक चौंकाने वाली बात यह भी है कि 40 प्रतिशत मामलों में बच्चों का शोषण उनकी अपनी मां द्वारा किया गया, जबकि 17 प्रतिशत मामलों में दोनों माता-पिता शामिल थे। यह दर्शाता है कि बच्चों के खिलाफ होने वाला दुर्व्यवहार केवल बाहर से नहीं आता, बल्कि यह घर के भीतर ही पनप रहा है। कोविड-19 के बाद बच्चों की दुनिया काफी हद तक ऑनलाइन हो गई है। ऑनलाइन पढ़ाई और सोशल मीडिया के बढ़ते उपयोग ने बच्चों को तकनीक से तो जोड़ा है, लेकिन साथ ही उन्हें नए तरह के खतरों से भी रूबरू कराया है। कई मामलों में देखा गया है कि बच्चों को शादी, नौकरी या प्यार के नाम पर फंसाकर यौन शोषण का शिकार बनाया गया। 21,000 मामलों में आरोपी कोई दोस्त, ऑनलाइन मित्र या लिव-इन पार्टनर था, जो पहले से पीड़िता को जानता था। बेशक, पॉक्सो अधिनियम जैसे कानून बच्चों को कानूनी सुरक्षा प्रदान करते हैं और इसके अंतर्गत विशेष अदालतें भी बनाई गई हैं, लेकिन असली बदलाव तब होगा जब समाज भी अपनी भूमिका निभाएगा। कानून के साथ-साथ समाज को मानसिकता बदलने, संवाद को बढ़ावा देने और बच्चों को जागरूक करने की जिम्मेदारी लेनी होगी। बच्चों को अच्छा और बुरा स्पर्श समझाना, स्कूलों में यौन शिक्षा को जरूरी बनाना, माता-पिता को बच्चों के साथ समय बिताने और संवाद कायम करने के लिए प्रेरित करना - यह सब बदलाव की दिशा में छोटे लेकिन महत्वपूर्ण कदम हो सकते हैं। बचपन को बचाना अब एक सामाजिक आंदोलन होना चाहिए। एनसीआरबी की रिपोर्ट हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि क्या हम एक सुरक्षित, संवेदनशील और जिम्मेदार समाज की ओर बढ़ रहे हैं या फिर तकनीकी विकास के पीछे मानवीय मूल्य खोते जा रहे हैं? अगर हम अपने बच्चों को सुरक्षा नहीं दे सकते, तो हम भविष्य को भी सुरक्षित नहीं बना सकते। बचपन को बचाना केवल सरकार की नहीं, हम सबकी जिम्मेदारी है। कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि मानवीय संवेदना इस तरह सिकुड़ गई है कि वह बच्चों के साथ भी यौन अपराध करने से परहेज नहीं करती है। ऐसे लोग क्यों नहीं सोचते कि उनके घर में भी बच्चे हैं, बेटियां हैं, भतीजे-भतीजियां हैं। जो काम अपने लिए और अपने परिवार के लिए सही नहीं है वह दूसरों के लिए कैसे सही हो सकता है। ऐसे लोगों के मन में भगवान की, समाज की और किसी भी बंधन की ङ्क्षचता नहीं होती है।
खतरे में बचपन