गणेश शंकर 'विद्यार्थी को हिंदी में उनके होने की एक अहमियत है। आजादी आंदोलन के दौर में दंगाई भीड़ के बीच भाईचारा कायम करने के लिए उन्होंने जान दे दी। वह 25 मार्च, 1931 की तारीख थी, जब उत्तर प्रदेश के कानपुर में हुए हिंदू-मुस्लिम दंगे के दौरान हिंसक भीड़ की चपेट में आ उन्होंने जान गंवा दी। एक ऐसा मसीहा जिसने इस दंगे के दौरान भी हजारों लोगों की जान बचाई थी और खुद धार्मिक उन्माद की भेंट चढ़ गया। आजादी के इस दीवाने और सांप्रदायिक सौहार्द के पुजारी गणेश शंकर 'विद्यार्थीÓ का जन्म 26 अक्तूबर, 1890 को इलाहाबाद के अतरसुइया मौहल्ले में हुआ था। इनके पिता जयनारायण गरीब, धार्मिक प्रवृत्ति के उसूलों पर चलने वाले इंसान थे।वह ग्वालियर रियासत के मुंगावली में एक स्कूल में हेडमास्टर थे। गणेश की प्रारंभिक शिक्षा-दीक्षा उर्दू और अंग्रेजी में हुई। 1905 ई. में हाईस्कूल और 1907 में प्राइवेट परीक्षार्थी के रूप में एंट्रेंस परीक्षा पास करने के बाद जब उन्होंने इलाहाबाद के कायस्थ पाठशाला में दाखिला लिया, तो उनका झुकाव पत्रकारिता की ओर हुआ।प्रसिद्ध लेखक पंडित सुंदर लाल के साथ वे हिंदी साप्ताहिक 'कर्मयोगीÓ के संपादन में उनकी सहायता करने लगे। कानपुर के करेंसी, पृथ्वीनाथ हाई स्कूल में अध्यापन के दौरान उन्होंने सरस्वती, कर्मयोगी, स्वराज्य (उर्दू) और हितवार्ता जैसे प्रकाशनों में लेख लिखे। पत्रकारिता, सामाजिक कार्य और स्वाधीनता आंदोलन से जुड़ाव के दौरान उन्होंने 'विद्यार्थीÓ उपनाम अपनाया।उसी दौर में उनके लेखन ने हिंदी पत्रकारिता जगत के अगुआ पंडित महाबीर प्रसाद द्विवेदी का ध्यान अपनी ओर खींचा। द्विवेदी जी ने सन 1911 में उन्हें अपनी साहित्यिक पत्रिका 'सरस्वतीÓ में उप-संपादक के पद पर कार्य करने का प्रस्ताव दिया, पर विद्यार्थी ने समाचार, सम-सामयिक और राजनीतिक विषयों में ज्यादा थी, इसलिए उन्होंने हिंदी साप्ताहिक 'अभ्युदयÓ में नौकरी कर ली। 1913 में विद्यार्थी कानपुर पहुंच गए और एक क्रांतिकारी पत्रकार और स्वाधीनता कर्मी के तौर पर 'प्रतापÓ पत्रिका निकालकर उत्पीड़न और अन्याय के खिलाफ आवाज बुलंद करना शुरू कर दिया। प्रताप के माध्यम से वह पीड़ितों, किसानों, मिल-मजदूरों और दबे-कुचले गरीबों का दुख उजागर करने लगे, जिसका नतीजा भी उन्हें भुगतना पड़ा। अंग्रेज सरकार ने उनपर कई मुकदमे किए, भारी जुर्माना लगाया और कई बार गिरफ्तार कर जेल भी भेजा।कहते हैं 1916 में महात्मा गांधी से पहली मुलाकात के बाद उन्होंने अपने आप को पूर्णतया स्वाधीनता आंदोलन में समर्पित कर दिया। उन्होंने साल 1917-18 में 'होम रूलÓ आंदोलन में अग्रणी भूमिका निभाई और कानपुर में कपड़ा मिल मजदूरों की पहली हड़ताल का नेतृत्व किया। साल 1920 में उन्होंने 'प्रतापÓ का दैनिक संस्करण निकालना शुरू कर दिया। इसी साल उन्हें रायबरेली के किसानों की लड़ाई लड़ने के लिए 2 साल के कठोर कारावास की सजा हुई।1922 में विद्यार्थी जेल से रिहा हुए पर सरकार ने उन्हें भड़काऊ भाषण देने के आरोप में फिर गिरफ्तार कर लिया। साल 1924 में उन्हें रिहा कर दिया गया, लेकिन तब तक उनका स्वास्थ्य बहुत बिगड़ गया था। साल 1929 में ही उन्हें यू.पी. कांग्रेस समिति का अध्यक्ष चुना गया और राज्य में सत्याग्रह आंदोलन के नेतृत्व की जिम्मेदारी दी गई। उसके बाद 1930 में उन्हें गिरफ्तार कर एक बार फिर जेल भेज दिया गया, जिसके बाद उनकी रिहाई गांधी-इरविन पैक्ट के बाद 9 मार्च, 1931 को हुई। विद्यार्थी को कानपुर शहर में सांप्रदायिक दंगों की वजह से 25 मार्च, 1931 को अपने प्राण गंवाने पड़े थे, लेकिन केवल दंगा ही उनकी मौत का कारण नहीं था।जब उनकी कलम चलती थी, तो अंग्रेजी हुकूमत की जड़ें हिल जाती थीं। भगत सिंह, बालकृष्ण शर्मा नवीन, सोहन लाल द्विवेदी, सनेही, प्रताप नारायण मिश्र जैसे तमाम देशभक्तों ने 'प्रताप प्रेसÓ की 'ज्वालाÓ से राष्ट्रप्रेम को घर-घर तक पहुंचा दिया था।गणेश शंकर विद्यार्थी एक महान क्रांतिकारी, निडर और निष्पक्ष पत्रकार, समाजसेवी और स्वतंत्रता सेनानी थे। भारत के स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास में उनका नाम अजर-अमर है। गणेश शंकर 'विद्यार्थीÓ एक ऐसे पत्रकार थे, जिन्होंने अपनी लेखनी की ताकत से भारत में अंग्रेजी शासन की नींद उड़ा दी थी।इस महान स्वतंत्रता सेनानी ने कलम और वाणी के साथ-साथ महात्मा गांधी के अहिंसावादी विचारों और क्रांतिकारियों को समान रूप से समर्थन और सहयोग दिया। अपने छोटे जीवन-काल में उन्होंने उत्पीड़न क्रूर व्यवस्था के खिलाफ आवाज उठाई। उत्पीड़न और अन्याय की खिलाफत में हमेशा आवाज बुलंद करना ही उनके जीवन का सर्वोच्च उद्देश्य था, चाहे वह नौकरशाह, जमींदार, पूंजीपति, उच्च जाति, संप्रदाय और धर्म की ही क्यों न हो। वह उसी के लिए जीए और उसी के लिए मर