2025 के बिहार विधानसभा चुनाव में पलायन का मुद्दा एक बार फिर चर्चा के केंद्र में है। जनसुराज पार्टी के प्रमुख प्रशांत किशोर ने अपने अभियान में इसको जिस तरह प्रमुखता दी है, उसने बाकी दलों को भी सोचने पर मजबूर कर दिया है। तीन साल से गांव-गांव घूम रहे प्रशांत किशोर लगातार यह संदेश दे रहे हैं कि जब तक वोट जात-पात देखकर डाला जाएगा, तब तक आपके बच्चे घर से बाहर ही मजदूर बने रहेंगे। उनकी बच्चों का चेहरा देखकर वोट करें वाली अपील ने युवाओं के दिल में जगह बनाई है। पलायन और रोजगार पर जोर देकर उन्होंने राजनीति को सामाजिक उत्तरदायित्व से जोड़ा है। उनके इस रुख ने राष्ट्रीय और क्षेत्रीय दोनों ही दलों को युवाओं से जुड़े मुद्दों पर मुखर होने को विवश किया है। एनडीए ने अपना संकल्प पत्र जारी करते हुए एक करोड़ नौकरियों, प्रत्येक जिले में मेगा स्किल सेंटर,औद्योगिक पार्क और सेमीकंडक्टर मैन्युफैक्चरिंग यूनिट जैसी बड़ी घोषणाएं की हैं। वहीं, महागठबंधन के तेजस्वी यादव ने अपने प्रण पत्र में 20 महीने में हर घर के एक सदस्य को सरकारी नौकरी देने का वादा किया है, जो संख्यात्मक रूप से लगभग 2.8 करोड़ नौकरियों के बराबर है। लेकिन क्या यह संभव है? बिहार की आर्थिक स्थिति और सरकारी व्यवस्था को देखते हुए यह सवाल यथार्थपरक लगता है। भर्ती परीक्षाओं में गड़बड़ियां, पेपर लीक और सालों तक अटके परिणाम युवाओं का मनोबल तोड़ चुके हैं। ऐसे में घोषणाएं केवल चुनावी आकर्षण बनकर रह जाती हैं। राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि यदि बिहार के मतदाता इस बार जातीय समीकरणों की जगह रोजगार और विकास को प्राथमिकता देंगे, तभी कुछ ठोस परिवर्तन संभव है। लेकिन अब तक का अनुभव बताता है कि यह यात्रा आसान नहीं है। छठ महापर्व, जो एकता और श्रद्धा का प्रतीक माना जाता है, इस बार राजनीति की रंगत से अछूता नहीं रहा। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने इसे बिहार और देश का गौरव बताया, जबकि कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने उन पर राजनीतिक ड्रामा का आरोप लगाया। तेजप्रताप यादव ने भी राहुल पर तंज कसा कि जो विदेश भाग जाते हैं, वे छठ को क्या जानें? आरोप-प्रत्यारोप का यह दौर दर्शाता है कि आस्था का पर्व भी चुनावी भाषणों की लपेट में आ गया है। इससे असली मुद्दे- रोजगार, शिक्षा, भ्रष्टाचार और महिला सुरक्षा पर विमर्श कमजोर पड़ने का खतरा है। मोकामा, आरा और पंडारक जैसी जगहों पर चुनावी हिंसा और हत्याओं ने इस लोकतांत्रिक पर्व पर सवाल खड़े किए हैं। जनसुराज समर्थक दुलारचंद यादव की हत्या और वीणा देवी के काफिले पर पथराव जैसी घटनाएं बताती हैं कि बिहार की राजनीति अब भी बाहुबल और जातीयता की गिरफ्त से पूरी तरह मुक्त नहीं हो पाई है। यह स्थिति न केवल कानून-व्यवस्था पर प्रश्न उठाती है, बल्कि जनता के विश्वास को भी कमजोर करती है। इस चुनाव में करीब 1.6 करोड़ युवा मतदाता निर्णायक भूमिका में हैं। यह वर्ग 18 से 25 वर्ष की उम्र का है और सीधे तौर पर बेरोजगारी, पलायन और शिक्षा की गुणवत्ता से प्रभावित है। यही वह वर्ग है जो अगर ठान ले, तो बिहार की राजनीति की दिशा और दशा बदल सकता है, लेकिन इसके लिए उन्हें जात-पात, धर्म और दावों की चमक से ऊपर उठकर अपनी आकांक्षाओं को प्राथमिकता देनी होगी। बिहार की असली चुनौती केवल सत्ता परिवर्तन नहीं, बल्कि सोच के परिवर्तन की है। जरूरत इस बात की है कि राज्य में उद्योगों का जाल बिछे, शिक्षा प्रणाली सशक्त हो और सरकारी भर्ती पारदर्शी बने। तभी छठ जैसे त्योहारों पर घर लौटने वालों को दोबारा जाना न पड़े। छठ का संदेश यही है कि प्रकाश की ओर बढ़ो, अंधकार से बाहर निकलो। इस चुनाव में बिहार को केवल वोट नहीं डालना है, बल्कि अपने भविष्य की दिशा तय करनी है। सच है कि बिहार का पलायन अब भी थमा नहीं है। रेलगाड़ियों की खचाखच भीड़, बस अड्डों पर उमड़ी लहरें और सड़कों पर चलती अंतहीन कतारें बताती हैं कि रोजगार की तलाश में हर साल लाखों बिहारी अपने घरों से सैकड़ों मील दूर जाने को मजबूर हैं। यह दृश्य किसी त्योहार की रौनक नहीं, बल्कि व्यवस्था की विफलता का प्रतीक है। गुजरात से दिल्ली, मुंबई, सूरत और पंजाब तक - हर जगह बिहारी मजदूरों की मेहनत झलकती है। वे दूसरों की अर्थव्यवस्था को मजबूत करते हैं, लेकिन खुद अपने राज्य की बुनियाद में हिस्सेदारी से वंचित रहते हैं। सवाल यह है कि आखिर कब तक बिहार के बेटे-बेटियां मेहमान मजदूर कहलाते रहेंगे?
आखिर कब तक पलायन?