नक्सलियों पर शिकंजा कसने के लिए सुरक्षा बल लगातार दबाव बना रहे हैं। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने पहले ही घोषणा कर रखी है कि 31 मार्च 2026 तक देश से नक्सलियों का सफाया कर दिया जाएगा। एक ऐसा समय था जब देश के कम से कम दस राज्यों में नक्सलियों की पकड़ मजबूत थी। आए दिन नक्सलियों द्वारा सुरक्षा बलों पर हमले की घटनाएं होती रहती थीं। नक्सली देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए बड़ा खतरा बने हुए हैं। नरेन्द्र मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद नक्सलियों के खिलाफ अभियान शुरू हुआ। केंद्र तथा राज्य सरकारों ने पिछड़े एवं वन क्षेत्रों जो नक्सलियों के गढ़ माना जाता है, वहां विकास कार्यों में तेजी लाते हुए काम शुरू किया। वहां की जनता को नक्सलियों के प्रभाव से मुक्त करने के लिए कारगर कदम उठाये गए। केंद्र सरकार ने आत्मसमर्पण करने वाले नक्सलियों के लिए विशेष योजना शुरू की, जिसका परिणाम भी सामने आया। केवल छत्तीसगढ़ में ही पिछले 20 महीनों के दौरान 508 नक्सलियों ने आत्मसमर्पण किया जो सुरक्षा बलों के लिए बड़ी उपलब्धि है। इसी तरह छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा और बीजापुर जिले में सक्रिय नक्सलियों को आत्मसमर्पण करने के लिए उचित वातावरण तैयार किया गया। इसके बावजूद जिन नक्सलियों ने आत्मसमर्पण नहीं किया उनके खिलाफ इन जिलों के जंगलों एवं दुर्गम क्षेत्रों में सशक्त पुलिस बलों द्वारा 3 दिसंबर को अभियान शुरू किया गया, जिसमें अब तक एक दर्जन से ज्यादा नक्सलियों की मौत हो चुकी है, जबकि तीन जवान भी शहीद हुए हैं। सुरक्षा बलों द्वारा जंगलों में बड़ा सर्च ऑपरेशन चलाया जा रहा है जिसमें और ज्यादा नक्सलियों के मारे की उम्मीद है। पुलिस ने मुठभेड़ स्थल से एसएलआर राइफलें, 303 राइफल समेत भारी मात्रा में हथियार एवं गोला-बारूद जब्द किया है। बीते दिनों पापाराव, केसा और चेतू के आत्मसमर्पण की चर्चा थी, ङ्क्षकतु चेतू ने अपने दस साथियों के साथ आत्मसमर्पण कर दिया। पिछले 11 महीनों में केवल जगदलपुर में ही सुरक्षा बलों ने 320 नक्सलियों को मौत के घाट उतार दिया था। छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा, बीजापुर एवं महाराष्ट्र के गोंदिया में कई नामी नक्सलियों ने या तो आत्मसमर्पण किया या उन्हें मौत के घाट उतार दिया गया। बस्तर में खंूखार नक्सली माधवी हिडिमा, उसकी पत्नी राजे उर्फ रजप्पा सहित छह नक्सलियों को छत्तीसगढ़-आंध्र प्रदेश सीमा पर सुरक्षा बलों ने मौत के घाट उतार दिया। उसकी हत्या के खिलाफ नक्सल समर्थक युवकों ने दिल्ली में प्रदर्शन किया तथा उसके समर्थन में नारे लगाये। हिडिमा कितना खूं्खार था इसका अंदाजा लगाना आसान नहीं है। वर्ष 2010 में दंतेवाड़ा में केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल पर हुए हमले में 76 जवान शहीद हुए थे। वर्ष 2013 में झिरम घाटी में कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष नंद कुमार पटेल सहित 25 लोगा मारे गए थे। 2017 में सुकमा में हुए हमले में 37 जवान शहीद हुए थे। इसी तरह 2021 में सुकमा में ही 22 जवान शहीद हुए थे। इन चारों घटनाओं में हिडिमा ही मुख्य साजिशकर्ता था। ये नक्सली देश के पहाड़ी, जंगली एवं दुर्गम क्षेत्रों में रहने वाले लोगों की गरीबी और मजबूरी का फायदा उठाकर उन क्षेत्रों में अपना ठिकाना बनाने में सफल रहे हैं और इन क्षेत्रों से अपनी गतिविधियां चलाते हैं ताकि सुरक्षा बल वहां आसानी से पहुंच नहीं सके। पिछले कई दशकों से नक्सली भारत को अस्थिर करने के लिए बाहरी शक्तियों के इशारे पर काम करते रहे हैं। चीन तथा कुछ अन्य देशों से इन्हें समर्थन एवं सहयोग मिलता रहा है। पिछले शासन के दौरान इनके खिलाफ कारगर कदम नहीं उठाया गया जिससे इनका विस्तार होता गया। ये नक्सली अन्य आतंकी समूहों की तरह भारत को तोडऩे और अस्थिर करने में लगे हुए हैं। खासकर छत्तीसगढ़, ओडिशा, आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र जैसे राज्यों में इनकी जड़ें काफी मजबूत थी जिसे कमजोर करने में मोदी सरकार काफी हद तक सफल हुई है।