रेलवे से संबंधित संसद की स्थायी समिति की हालिया रिपोर्ट ‘भारतीय रेल की बढ़ती माल भाड़े संबंधी आय और समर्पित मालवहन गलियारों का विकास’ एक ऐसे समय में सामने आई है, जब भारतीय रेल अपने राजस्व मॉडल, प्रतिस्पर्धात्मकता और सामाजिक दायित्व- तीनों के बीच संतुलन खोजने की कोशिश कर रही है। यह रिपोर्ट माल भाड़े पर केंद्रित है, लेकिन अप्रत्यक्ष रूप से यह रेलवे की उस पुरानी संरचनात्मक समस्या की ओर भी इशारा करती है, जिसे अब टालना मुश्किल होता जा रहा है। भारतीय रेल की आय का सबसे बड़ा स्रोत माल ढुलाई है, जो कुल राजस्व का लगभग 65 से 70 प्रतिशत योगदान करती है। वर्ष 2023-24 में 2.6 लाख करोड़ रुपए की कुल आय में से 1.7 लाख करोड़ रुपए माल भाड़े से आए। यह आंकड़ा बताता है कि रेलवे की वित्तीय सेहत कितनी हद तक माल परिवहन पर निर्भर है। समिति ने ठीक ही सुझाव दिया है कि रेलवे को कोयला और लौह अयस्क जैसी पारंपरिक वस्तुओं की ढुलाई से आगे बढक़र ई-कॉमर्स, पार्सल और आधुनिक लॉजिस्टिक्स जैसे उभरते क्षेत्रों पर ध्यान देना चाहिए। भारत में ई-कॉमर्स का तेजी से विस्तार हो रहा है और यह रेलवे के लिए राजस्व का बड़ा अवसर बन सकता है, बशर्ते वह समय का पालन, ट्रैकिंग और टर्मिनल सुविधाओं में सुधार करे। समर्पित मालवहन गलियारों के विस्तार और नए कॉरिडोरों के निर्माण का सुझाव भी महत्वपूर्ण है। निजी फंडिंग की संभावनाएं इस क्षेत्र में निवेश को तेज कर सकती हैं और रेलवे पर पूंजीगत बोझ कम कर सकती हैं। साथ ही, ‘गति शक्ति’ जैसी योजनाएं लॉजिस्टिक्स लागत घटाने और रेलवे को सडक़ परिवहन के मुकाबले प्रतिस्पर्धी बनाने में सहायक हो सकती हैं। हालांकि, समिति की एक अहम चिंता माल भाड़े की दरों को लेकर है। अंतिम बड़ा संशोधन 2018 में हुआ था। स्थिर दरों ने अल्पकाल में अतिरिक्त लोडिंग को प्रोत्साहित किया है, लेकिन दीर्घकाल में यह रणनीति जोखिम भरी हो सकती है। सांसदों का यह सुझाव तर्कसंगत है कि दरों की वार्षिक समीक्षा होनी चाहिए ताकि रेलवे सडक़, जल और वायु परिवहन के मुकाबले प्रतिस्पर्धी बना रहे। यह भी सच है कि 1991 में माल परिवहन में रेलवे की हिस्सेदारी 60 प्रतिशत थी, जो अब घटकर 27-29 प्रतिशत रह गई है। सरकार का लक्ष्य इसे 2030-31 तक 45 प्रतिशत तक ले जाना है, जो जलवायु प्रतिबद्धताओं के लिहाज से भी जरूरी है। लेकिन रिपोर्ट का सबसे संवेदनशील और शायद सबसे महत्वपूर्ण पहलू यात्री किराये से जुड़ा है। भारतीय रेल वर्षों से यात्री सेवाओं में दी जाने वाली भारी सब्सिडी की भरपाई माल भाड़े से करती रही है। पुराने महालेखा परीक्षक की रिपोर्टों के अनुसार यात्री टिकटों पर औसतन 45 प्रतिशत की सब्सिडी दी जाती है। यही वह मूल समस्या है, जिस पर समिति भी पूरी स्पष्टता से बात नहीं कर पाई है। वातानुकूलित श्रेणियों की आय की समीक्षा और सामान्य श्रेणी से छेड़छाड़ न करने की सलाह राजनीतिक रूप से सुरक्षित हो सकती है, लेकिन आर्थिक रूप से यह टिकाऊ नहीं है। वास्तविक जरूरत यह है कि रेल यात्रा को केवल सस्ता रखने के बजाय सुलभ, आरामदेह और सुरक्षित बनाने पर जोर दिया जाए। यदि इसके लिए सामान्य श्रेणी के किराये में सीमित और तर्कसंगत वृद्धि करनी पड़े, तो उससे बचना नहीं चाहिए- बशर्ते यात्रियों को बेहतर सुविधाएं, स्वच्छता और समयपालन मिले। आठवां वेतन आयोग 2026 से वेतन और पेंशन खर्च को और बढ़ा सकता है। ऐसे में सवाल उठता है कि माल भाड़ा कब तक यात्रियों और पेंशनभोगियों- दोनों का बोझ उठाएगा? माल भाड़े को मजबूत करना जरूरी है, लेकिन यह अकेला समाधान नहीं है। रेलवे को अब यात्री किराए की राजनीतिक संवेदनशीलता से ऊपर उठकर एक संतुलित, पारदर्शी और टिकाऊ राजस्व मॉडल अपनाना होगा। अन्यथा, भारतीय रेल बार-बार उन्हीं समस्याओं से जूझती रहेगी, जिनका समाधान वर्षों से टलता आ रहा है।
भाड़े में बढ़ोत्तरी की तैयारी