इंटेंसिव केयर यूनिट (आईसीयू) को किसी भी अस्पताल का सबसे सुरक्षित और संवेदनशील हिस्सा माना जाता है। यही वह स्थान है, जहां जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे मरीजों को अत्याधुनिक चिकित्सा सुविधाओं के सहारे बचाने का हरसंभव प्रयास किया जाता है, लेकिन यदि यही स्थान संक्रमण का सबसे बड़ा केंद्र बन जाए तो यह न केवल चिकित्सा व्यवस्था पर सवाल खड़े करता है, बल्कि मरीजों और उनके परिजनों की चिंता को कई गुना बढ़ा देता है। अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) के माइक्रोबायोलॉजी एवं इंफेक्शन कंट्रोल विभाग की ओर से किये गए हालिया व्यापक अध्ययन ने इसी कड़वी सच्चाई को सामने रखा है। इस अध्ययन में देश के 34 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के 190 से अधिक आईसीयू को शामिल किया गया, जो इसे अब तक के सबसे बड़े और गंभीर अध्ययनों में शामिल करता है। इसके निष्कर्ष बेहद चिंताजनक हैं। अध्ययन के अनुसार आईसीयू में भर्ती मरीजों को संक्रमण का खतरा सबसे अधिक रहता है। विशेषकर वे मरीज जिनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता पहले से ही कमजोर होती है, उनके लिए यह स्थिति और भी जानलेवा साबित हो सकती है। गंभीर रूप से बीमार मरीजों को लंबे समय तक आईसीयू में रहना पड़ता है। इस दौरान वे वेंटिलेटर, कैथेटर, सेंट्रल लाइन जैसे जीवन रक्षक उपकरणों पर निर्भर रहते हैं। ये उपकरण जहां एक ओर जीवन बचाने में सहायक होते हैं, वहीं दूसरी ओर संक्रमण का प्रवेश द्वार भी बन सकते हैं। अध्ययन में स्पष्ट किया गया है कि ऑपरेशन के बाद होने वाले संक्रमणों में रक्त संक्रमण, फेफड़ों का संक्रमण (विशेषकर वेंटिलेटर से होने वाला निमोनिया) और मूत्र मार्ग संक्रमण प्रमुख हैं। सबसे गंभीर पहलू यह है कि आईसीयू में मल्टी ड्रग रेजिस्टेंट बैक्टीरिया के पनपने का खतरा तेजी से बढ़ रहा है। ये ऐसे बैक्टीरिया होते हैं, जिन पर सामान्य एंटीबायोटिक दवाएं असर नहीं करतीं। नतीजतन, मरीजों का इलाज और जटिल हो जाता है, अस्पताल में रहने की अवधि बढ़ जाती है और इलाज की लागत भी कई गुना बढ़ जाती है। कई मामलों में यह संक्रमण जानलेवा भी साबित हो सकता है। यह समस्या केवल भारत तक सीमित नहीं है। इससे पहले ब्रिटेन के प्रतिष्ठित मेडिकल जर्नल द लैंसेट ग्लोबल हेल्थ में भी भारतीय आईसीयू में रक्त संक्रमण से जुड़े आंकड़ों को लेकर चिंता जताई जा चुकी है, लेकिन एम्स का यह ताजा अध्ययन इस संकट की व्यापकता और गंभीरता को और स्पष्ट करता है। यह अध्ययन दरअसल स्वास्थ्य तंत्र के लिए एक चेतावनी है कि अत्याधुनिक तकनीक और संसाधनों के बावजूद बुनियादी संक्रमण नियंत्रण उपायों में चूक भारी पड़ सकती है। समाधान क्या है? अध्ययन से जुड़े विशेषज्ञों की राय स्पष्ट है। सबसे पहले, चिकित्सकों और नर्सिंग स्टाफ को हाथों की स्वच्छता पर कठोरता से अमल करना होगा। जीवन रक्षक उपकरणों की नियमित और वैज्ञानिक तरीके से सफाई तथा कीटाणु मुक्त करना अनिवार्य होना चाहिए। एंटीबायोटिक दवाओं का अंधाधुंध इस्तेमाल रोककर उनके संयमित और विवेकपूर्ण उपयोग पर जोर देना होगा। इसके साथ ही आईसीयू में भर्ती मरीजों की निरंतर और संवेदनशील निगरानी बेहद जरूरी है, ताकि संक्रमण के शुरुआती संकेतों को समय रहते पहचाना जा सके। इस पूरी प्रक्रिया में मरीजों के परिजनों की भूमिका भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। उन्हें भी आईसीयू के नियमों का पालन करते हुए स्वच्छता और सावधानी बरतनी होगी। अनावश्यक आवाजाही, भीड़ और लापरवाही संक्रमण के खतरे को बढ़ा सकती है। निष्कर्षत:, एम्स का यह अध्ययन आंख खोलने वाला है। आईसीयू को सचमुच जीवन रक्षक बनाना है, तो संक्रमण नियंत्रण को सर्वोच्च प्राथमिकता देनी होगी। वरना जिस स्थान पर जीवन बचाया जाना चाहिए, वही स्थान अनजाने में मृत्यु का कारण बन सकता है। यह समय आत्ममंथन और त्वरित सुधार का है- चिकित्सा व्यवस्था के लिए भी और समाज के लिए भी।