गणतंत्र दिवस

आज गणतंत्र दिवस के अवसर पर जब पूरा देश उत्सव के रंग में डूबा है, तब यह आत्ममंथन करना भी उतना ही आवश्यक है कि हमारा संसदीय लोकतंत्र किस दिशा में अग्रसर है। भारत को विश्व का सबसे बड़ा गणतांत्रिक देश कहा जाता है और यह गौरव केवल जनसंख्या के कारण नहीं, बल्कि उस लोकतांत्रिक व्यवस्था के कारण है जिसमें जनता सर्वोच्च है और सरकार उसकी प्रतिनिधि मात्र। संसदीय लोकतंत्र की बुनियाद ही इस सिद्धांत पर टिकी है कि सत्ता का स्रोत जनता है और उसका प्रयोग जनप्रतिनिधियों के माध्यम से संविधान की मर्यादाओं में रहकर किया जाता है। लोकसभा, राज्यसभा, विधानसभा और विधान परिषद- ये सभी संस्थाएं लोकतंत्र को जीवंत बनाए रखने के माध्यम हैं,  किंतु जब इन सदनों में बैठे जनप्रतिनिधियों के आचरण और गतिविधियों पर नजर डालते हैं तो अक्सर यह प्रश्न उठता है कि क्या वे जनता के विश्वास पर खरे उतर पा रहे हैं? बार-बार व्यवधान, शोरगुल, आरोप-प्रत्यारोप और संसदीय मर्यादाओं की अनदेखी से लोकतंत्र की छवि धूमिल होती है। यदि जनप्रतिनिधि ही लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा नहीं करेंगे, तो फिर उन्हें जनता से मिले सार्वभौम अधिकारों का नैतिक आधार कैसे प्राप्त होगा? संसद किसी दल विशेष का मंच नहीं, बल्कि लोकतंत्र का मंदिर है। यहां सत्ता और विपक्ष दोनों की समान जिम्मेदारी है कि वे जनहित को सर्वोपरि रखें। दुर्भाग्य से अक्सर संसद को अखाड़े के रूप में प्रयोग किया जाता है, जहां मुद्दों से अधिक महत्व राजनीतिक लाभ-हानि को दिया जाता है, जबकि सच्चाई यह है कि सदन में बैठे नेता व्यक्तिगत स्तर पर एक-दूसरे को जानते हैं, मित्र भी हैं और राजनीतिक परिस्थितियों के अनुसार दल बदलते भी रहे हैं। ऐसे में संसद को टकराव का नहीं, संवाद और सहमति का केंद्र होना चाहिए। लोकतंत्र में विपक्ष की भूमिका उतनी ही महत्वपूर्ण है जितनी सरकार की। विपक्ष न केवल सरकार की आलोचना करता है, बल्कि उसे जवाबदेह भी बनाता है। बहुमत के आधार पर सरकार बनना लोकतांत्रिक प्रक्रिया है, किंतु बहुमत का अर्थ यह नहीं कि अल्पमत की आवाज को अनसुना कर दिया जाए। यदि संसद और विधानसभाओं में विपक्ष की बात नहीं सुनी जाएंगी, तो कानून और नीतियां व्यापक जनहित का प्रतिनिधित्व नहीं कर पाएंगी। आजादी के बाद बने कई कानूनों में लगातार संशोधन इस बात का संकेत है कि समय के साथ जनता की अपेक्षाएं बदली हैं और लोकतंत्र को समावेशी बनाए बिना आगे बढऩा संभव नहीं। हाल के वर्षों में संसद के काम-काज को लेकर उठे विवाद, प्रश्नकाल को स्थगित करने का निर्णय इसी चिंता को और गहरा करता है। प्रश्नकाल को संसदीय लोकतंत्र की आत्मा कहा जाता है। यही वह मंच है जहां सांसद पार्टी लाइन से ऊपर उठकर सरकार से सीधे सवाल करते हैं और उसकी जवाबदेही तय करते हैं। प्रश्नकाल के दौरान सरकार को न केवल विपक्ष, बल्कि कई बार अपने ही दल के सांसदों के सवालों का सामना करना पड़ता है, जिससे लोकतांत्रिक संतुलन बना रहता है। यह तर्क  कि असाधारण परिस्थितियों में असाधारण निर्णय आवश्यक हैं, पूरी तरह अस्वीकार्य नहीं है। किंतु ऐसे निर्णय लेते समय यह भी सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि लोकतांत्रिक अधिकारों में अनावश्यक कटौती न हो। सरकार को यह संदेश नहीं जाना चाहिए कि वह सदन में सवालों से बचना चाहती है। लोकतंत्र की मजबूती पारदर्शिता और जवाबदेही से आती है, न कि प्रक्रियाओं को सीमित करने से। गणतंत्र दिवस केवल उत्सव का अवसर नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक मूल्यों को पुन: स्मरण करने का दिन है। देश में लोकतंत्र तभी सशक्त  होगा जब सरकार और विपक्ष दोनों संविधान की भावना का सम्मान करेंगे। संसद को बहस, विमर्श और जनहितकारी निर्णयों का मंच बनाना ही हमारे गणतंत्र के प्रति सच्ची आस्था होगी और तभी गणतंत्र दिवस मनाना सार्थक साबित होगा।