बच्चों और किशोरों की सोशल मीडिया पर बढ़ती अति-सक्रियता आज केवल अभिभावकों की चिंता भर नहीं रह गई है, बल्कि यह देश के सामाजिक, शैक्षणिक और मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ा एक गंभीर राष्ट्रीय प्रश्न बन चुकी है। पढ़ाई से भटकाव, एकाग्रता में गिरावट, नींद की कमी, चिड़चिड़ापन और आभासी दुनिया में खो जाने की प्रवृत्ति ये सभी संकेत एक गहरे संकट की ओर इशारा करते हैं। ऐसे समय में हालिया आर्थिक सर्वे में सोशल मीडिया तक उम्र के हिसाब से पहुंच सीमित करने का सुझाव एक साहसिक और स्वागतयोग्य पहल है। पिछले एक दशक से डिजिटल विस्तार को लगभग बिना शर्त सकारात्मक बदलाव के रूप में प्रस्तुत किया जाता रहा है। यह तर्क  दिया गया कि सोशल मीडिया लोकतंत्रीकरण को बढ़ावा देगा, डिजिटल साक्षरता की खाइयों को पाटेगा और शिक्षा को आधुनिक बनाएगा। इन दावों में आंशिक सच्चाई जरूर है, लेकिन आर्थिक सर्वे ने पहली बार संतुलित दृष्टि अपनाते हुए यह स्वीकार किया है कि अनियंत्रित डिजिटल एक्सपोजर तेजी से एक सार्वजनिक स्वास्थ्य समस्या बनता जा रहा है। डिजिटल लत अब महज व्यावहारिक कमजोरी नहीं, बल्कि मानसिक स्वास्थ्य, शैक्षणिक प्रदर्शन और भविष्य की उत्पादकता को प्रभावित करने वाली गंभीर चुनौती है। सर्वे की सिफारिशें इस बहस को भावनाओं से निकालकर तथ्यों और नीति के धरातल पर लाती हैं। उम्र के अनुसार एक्सेस सीमाएं तय करना, प्लेटफॉर्मों पर उम्र-सत्यापन की जवाबदेही तय करना, बच्चों के लिए सरल और सीमित फीचर वाले डिवाइस विकसित करना तथा ऑनलाइन कक्षाओं पर अत्यधिक निर्भरता कम करना ये सभी सुझाव दूरदर्शी हैं। खास बात यह है कि इसमें बच्चों को सम्मोहित करने वाले डिजिटल डिजाइनों से सुरक्षा देने की जरूरत पर भी जोर दिया गया है, जो कोमल मन-मस्तिष्क पर गहरा नकारात्मक प्रभाव डालते हैं। दरअसल, यह पहल किसी अलग-थलग सोच का परिणाम नहीं है, बल्कि वैश्विक सहमति का अनुसरण करती है। अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर यह स्पष्ट हो चुका है कि केवल माता-पिता के व्यक्तिगत नियंत्रण से इस समस्या का समाधान संभव नहीं। ऑस्ट्रेलिया की ओर से सोलह वर्ष से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया पर रोक और फ्रांस की ओर से पंद्रह वर्ष से कम उम्र के बच्चों की सीधी पहुंच सीमित करने जैसे कदम इस बात के प्रमाण हैं कि सरकारों को हस्तक्षेप करना ही पड़ा है। कई अन्य देश भी सख्त नियमन की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहे हैं। भारत के संदर्भ में यह चुनौती और भी जटिल है। एक ओर यहां युवाओं की आबादी विशाल है और डिजिटल क्रांति से पूरी तरह अलग रहना संभव नहीं, वहीं दूसरी ओर स्मार्टफोन का तेजी से बढ़ता इस्तेमाल और विदेशी प्लेटफॉर्मों से प्रसारित अपसंस्कृृति किशोरों को पथभ्रष्ट करने में खतरनाक भूमिका निभा रही है। समय से पहले वयस्कता की ओर धकेलना, मानवीय संवेदनाओं का क्षरण और यौन अपराधों के जोखिम में वृद्धि ये सभी संकेत किसी भी सभ्य समाज के लिए गंभीर चेतावनी हैं, विशेषकर भारत जैसे देश में जहां सांस्कृृतिक मूल्यों और संबंधों की शुचिता को हमेशा प्राथमिकता दी गई है। इस संकट से उबरने के लिए प्लेटफॉर्म-स्तरीय सुरक्षा उपायों और फैमिली डेटा प्लान जैसी व्यवस्थाओं की भी जरूरत है, जो पढ़ाई और मनोरंजन के बीच स्पष्ट अंतर कर सकें। साथ ही यह स्वीकार करना होगा कि एक ही नियम सब पर समान रूप से लागू नहीं हो सकता। नीति-निर्माण में लचीलापन, सामाजिक संवाद और वैज्ञानिक अध्ययन तीनों आवश्यक हैं। अंतत:, बच्चों और किशोरों को डिजिटल लत से बचाना केवल सरकार या अभिभावकों की नहीं, बल्कि समाज की सामूहिक जिम्मेदारी है। सख्त लेकिन संवेदनशील सरकारी पहल, जागरूक माता-पिता और जवाबदेह डिजिटल प्लेटफॉर्म- इन तीनों के समन्वय से ही इस संकट का आशाजनक समाधान संभव है। डिजिटल भविष्य को अपनाते हुए यदि हम अपने बच्चों के वर्तमान और मानसिक स्वास्थ्य की रक्षा नहीं कर पाए, तो विकास की यह दौड़ खोखली साबित होगी। समय के साथ बहुत कुछ बदल गया है। परंतु बदला समय नुकसानदेह न हो इस बात का हमें सदैव ख्याल रखना चाहिए।