वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण की ओर से प्रस्तुत वित्त वर्ष 2026-27 का केंद्रीय बजट एक ऐसे दौर में आया है, जब भारत की अर्थव्यवस्था से अपेक्षाएं भी ऊंची हैं और चुनौतियां भी जटिल। विकसित भारत के संकल्प के साथ पेश किया गया यह बजट आर्थिक विकास को गति देने, राजकोषीय अनुशासन बनाए रखने और राजनीतिक संदेश साधने जैसे तीनों उद्देश्यों के बीच संतुलन बनाने की कोशिश करता दिखता है। इस बजट की सबसे बड़ी विशेषता है बुनियादी ढांचे पर सरकार का निरंतर और आक्रामक फोकस। पूंजीगत व्यय को बढ़ाकर 12.2 लाख करोड़ रुपए करना केवल एक आंकड़ा नहीं, बल्कि पिछले एक दशक की नीति दिशा का संकेत है। वित्त वर्ष 2015 में जहां कैपेक्स 2 लाख करोड़ रुपए था, वहीं आज यह छह गुना से अधिक हो चुका है। सडक़, रेल, लॉजिस्टिक्स, औद्योगिक गलियारों और अंतर्देशीय जल परिवहन पर जोर यह दर्शाता है कि सरकार रोजगार सृजन और दीर्घकालिक उत्पादकता को विकास की कुंजी मान रही है। हालांकि, इस विकासोन्मुखी दृष्टिकोण के साथ वित्तीय अनुशासन को भी महत्व दिया गया है। 2026-27 के लिए राजकोषीय घाटे का लक्ष्य जीडीपी का 4.3 प्रतिशत रखना सरकार की उस प्रतिबद्धता को दर्शाता है, जिसमें वह खर्च बढ़ाने के बावजूद वित्तीय संतुलन से समझौता नहीं करना चाहती। यह संकेत वैश्विक निवेशकों और रेटिंग एजेंसियों के लिए भी महत्वपूर्ण है। बजट में मध्यम वर्ग को स्पष्ट राहत दी गई है। विदेश यात्रा पैकेज, शिक्षा और चिकित्सा उद्देश्यों के लिए विदेश भेजे जाने वाले धन पर टीसीएस को घटाकर 2 प्रतिशत करना उन परिवारों के लिए बड़ी राहत है, जिन पर पहले ऊंची दरों का बोझ था। साथ ही छोटे करदाताओं के लिए विदेशी संपत्ति प्रकटीकरण योजना और 20 लाख रुपए से कम की अचल विदेशी संपत्ति पर आपराधिक कार्रवाई से छूट- कर प्रशासन को कुछ हद तक मानवीय बनाने की पहल कही जा सकती है। दूसरी ओर शेयर बाजार के ट्रेडर्स के लिए बजट कड़वा रहा है। फ्यूचर्स एंड ऑप्शंस पर सिक्योरिटीज ट्रांजेक्शन टैक्स में बढ़ोतरी और शेयर बायबैक से होने वाली आय को शेयरधारकों के हाथों में कैपिटल गेन मानकर टैक्स लगाना सरकार के उस रुख को दर्शाता है, जिसमें वह सट्टात्मक गतिविधियों पर लगाम कसना चाहती है। हालांकि, इससे बाजार में अल्पकालिक उतार-चढ़ाव बढऩे की आशंका भी जताई जा रही है। एमएसएमई और मैन्युफैक्चरिंग पर फोकस इस बजट की एक और मजबूत कड़ी है। 10,000 करोड़ रुपए का एसएमई ग्रोथ फंड, इंडिया सेमीकंडक्टर मिशन 2.0, बायो-फार्मा शक्ति और रेयर अर्थ परमानेंट मैग्नेट्स के लिए विशेष योजनाएं- ये सभी भारत को वैश्विक सप्लाई चेन में मजबूत भूमिका दिलाने की रणनीतिक हिस्सा हैं। स्वास्थ्य क्षेत्र में कैंसर की 17 दवाओं पर कस्टम ड्यूटी छूट और ग्रीन एनर्जी से जुड़े उत्पादों को राहत सामाजिक और पर्यावरणीय प्राथमिकताओं को भी रेखांकित करती है। लेकिन बजट का एक अहम पहलू इसका राजनीतिक आयाम है, खासकर पश्चिम बंगाल के संदर्भ में। दानकुनी-सूरत समर्पित मालगाड़ी कॉरिडोर, दुर्गापुर केंद्रित पूर्वी तट औद्योगिक गलियारा और असम सहित पूर्वोत्तर राज्यों में पर्यटन परियोजनाएं- ये घोषणाएं जहां विकास की संभावनाएं दिखाती हैं, वहीं विपक्ष इसे चुनावी रणनीति के तौर पर देख रहा है। तृणमूल कांग्रेस के आरोप और भाजपा के पलटवार ने यह साफ कर दिया है कि केंद्रीय बजट केवल आर्थिक दस्तावेज नहीं, बल्कि एक शक्तिशाली राजनीतिक उपकरण भी है। अंतत:, बजट 2026-27 एक ऐसा दस्तावेज है जो युवाशक्ति, उत्पादन क्षमता और अवसंरचना पर दांव लगाता है, लेकिन साथ ही यह सवाल भी छोड़ता है कि घोषित योजनाएं जमीन पर कितनी तेजी और ईमानदारी से उतरेंगी। विकास और राजनीति के इस संगम में अब फैसला जनता और समय को करना है कि यह बजट वास्तव में परिवर्तन का वाहक बनता है या सिर्फ  उम्मीदों का पुल।