भारत और अमरीका के बीच हुए व्यापार समझौते को लेकर संसद से लेकर बाहर तक बवाल मचा हुआ है। अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप तथा उनके मंत्रियों द्वारा दिये गए बयान को लेकर विवाद मचा हुआ है। अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने मंगलवार की रात यह घोषणा की थी कि भारत के साथ ट्रेड डील पर सहमति बन गई है। अमरीका ने भारत से टैरिफ घटाकर केवल 18 प्रतिशत कर दिया है। साथ ही ट्रंप ने यह भी कहा कि अब भारत ने रूस से कच्चा तेल खरीदना धीरे-धीरे बंद कर दिया है। अमरीका के कृृषि मंत्री ने कहा कि भारत ने अमरीकी कृृषि उत्पादों के लिए अपना बाजार खोलने की हामी भरी है। इसी तरह अमरीकी वित्त मंत्री ने भी ट्रंप के समर्थन में बयान दिया। इसको लेकर विपक्षी पाॢटयां नरेन्द्र मोदी सरकार को कटघरे में खड़ा कर रही है। संसद में विपक्षी सदस्यों ने इस मुद्दे पर सरकार को घेरा जिस दौरान काफी हंगामा भी हुआ है। इस पर विपक्षी पाॢटयां सरकार से अपनी स्थिति स्पष्ट करने की मांग कर रही है। वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने अपने बयान में कहा है कि सरकार कृृषि एवं डेयरी क्षेत्र को अमरीकी उत्पादों के लिए नहीं खोलेगी। उन्होंने कहा कि सरकार अपने पुराने वादों पर कायम है, लेकिन विपक्षी सदस्य इसे मानने को तैयार नहीं हैं। विपक्षी पाॢटयां यह भी मांग कर रही हैं कि सरकार स्पष्ट करे कि क्या भारत रूस से कच्चा तेल खरीदना बंद कर दिया है? हालांकि रूस ने अपने बयान में कहा है कि भारत की तरफ से कच्चे तेल की खरीद बंद करने के बारे में पूरा आधिकारिक अनुरोध नहीं मिला है। अभी तक भारत-अमरीका के बीच प्रस्तावित ट्रेड पर हस्ताक्षर नहीं हुए हैं। अभी तक शर्तों के बारे में स्थिति स्पष्ट नहीं हो पायी है। विशेषज्ञों का मानना है कि रियायती दर पर भारत कहीं से भी कच्चा तेल खरीद सकता है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि वह रूस से रियायती दर पर तेल खरीदना बंद कर दे। भारत वेनेजुएला से कच्चा तेल खरीदने के लिए आगे बढ़ रहा है। ऐसी खबर है कि वेनेजुएला रूस की तरह भारत को रियायती दर पर कच्चे तेल की आपूॢत करेगा। अमरीकी कार्रवाई के बाद वेनेजुएला के तेल कुएं पूरी तरह अमरीका के नियंत्रण में है। पर्दे की पीछे की कहानी सार्वजनिक होना बाकी है। ऐसा लगता है कि राष्ट्रपति ट्रंप अपने देश के लोगों को शांत करने के लिए ट्रेड डील के बारे में जानबूझ कर अमरीकी पक्ष को तरजीह दे रहे हैं। वास्तविकता यह है कि यूरोपीय यूनियन के साथ मुक्त व्यापार समझौता होने के बाद अमरीका पूरी तरह हिल गया था। राष्ट्रपति ट्रंप पर यह दबाव बढऩे लगा था कि वह भारत से टैरिफ कम करके ट्रेड डील करे। अगर ऐसा करने में विलंब होता है तो यूरोपीय कंपनियां अपनी पैठ जमा लेगी, जो अमरीका के लिए आत्मघाती साबित होगा। अमरीका से भारत के दूर होने से ङ्क्षहद-प्रशांत क्षेत्र में अमरीका की रणनीति प्रभावित होगी। यह सबको मालूम है कि चीन के प्रभाव को रोकने के लिए एशिया में केवल भारत ही सक्षम है। अमरीका किसी भी हालत में भारत को दूर करना नहीं चाहता ताकि उसकी चीन रणनीति प्रभावित हो। पहले राष्ट्रपति ट्रंप ने भारत पर दबाव बनाकर या धमका कर पाले में लाने की कोशिश की थी, जो सफल नहीं हुई। भारत सरकार को विपक्ष द्वारा उठाये गए आशंकाओं को दूर करना चाहिए। साथ ही कृृषि, डेयरी एवं मत्स्य क्षेत्र को अमरीकी उत्पादों के लिए किसी भी कीमत पर नहीं खोलना चाहिए।