भारत की डिजिटल छलांग जितनी तेज हुई है, साइबर जोखिम उतनी ही भयावह गति से बढ़े हैं। हालिया जोखिम सर्वेक्षण, जो फेडरेशन ऑफ इंडियन चैंबर्स ऑफ कॉमर्स ऐंड इंडस्ट्री (फिक्की) और ईवाई द्वारा 2026 में जारी किया गया- स्पष्ट संकेत देता है कि देश का उद्योग जगत साइबर सुरक्षा को अब विकल्प नहीं, बल्कि अस्तित्व का प्रश्न मान रहा है। सर्वे में शामिल 61 प्रतिशत कारोबारी नेतृत्व ने माना कि संस्थागत प्रदर्शन को आकार देने में साइबर सुरक्षा प्रमुख कारक बन चुकी है। आधे से अधिक उत्तरदाताओं ने डेटा चोरी और अंदरूनी धोखाधड़ी के बढ़ते मामलों पर गंभीर चिंता जताई। यह चिंता निराधार नहीं है। डिजिटल अर्थव्यवस्था के विस्तार, क्लाउड अपनाने की रफ्तार और डेटा-आधारित तकनीकों के व्यापक उपयोग ने कंपनियों को नई संभावनाएं दी हैं, लेकिन साथ ही उन्हें असुरक्षित भी बनाया है। नैसकॉम के तहत डेटा सिक्योरिटी काउंसिल ऑफ इंडिया के अनुसार देश में 400 से अधिक साइबर सुरक्षा उत्पाद कंपनियां सक्रिय हैं, जिन्होंने 2025 में लगभग 4.46 अरब डॉलर का राजस्व अर्जित किया। यह वृद्धि दर्शाती है कि मांग बढ़ रही है, परंतु खतरे उससे भी तेजी से बढ़ रहे हैं। अंतर्राष्ट्रीय दूरसंचार संघ द्वारा प्रकाशित ग्लोबल साइबर सुरक्षा सूचकांक 2024 में भारत ने 98.49 का प्रभावशाली स्कोर प्राप्त कर पहली श्रेणी में स्थान पाया। यह उपलब्धि सराहनीय है, किंतु जमीनी स्तर की चुनौतियां अब भी गंभीर हैं। साइबर सुरक्षा कंपनी सेक्राइट की इंडिया साइबर थ्रेट रिपोर्ट- 2026 के अनुसार अक्तूबर 2024 से सितंबर 2025 के बीच 26.5 करोड़ से अधिक साइबर हमले दर्ज किये गए। वहीं चेक प्वॉइंट सॉफ्टवेयर टेक्नॉलजीज की रिपोर्ट बताती है कि भारतीय संगठनों पर हर सप्ताह औसतन 2,000 से अधिक हमले होते हैं- जो वैश्विक औसत से कहीं अधिक है। स्पष्ट है कि साइबर जोखिम अब केवल आईटी विभाग की समस्या नहीं रहे, वे सीधे परिचालन, राजस्व और निवेशकों के विश्वास को प्रभावित कर रहे हैं। ऐसे में कृृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) को लेकर उभरती दुविधा भी चिंता बढ़ाती है। 59 प्रतिशत अधिकारियों ने माना कि एआई अपनाने की धीमी गति से परिचालन प्रभावित हो रहा है, जबकि 54 प्रतिशत का मत है कि एआई से जुड़े नैतिक और संचालन संबंधी मुद्दों का समुचित प्रबंधन नहीं हुआ है। यानी उद्योग एआई की क्षमता को समझता है, पर उसकी जवाबदेही और सुरक्षा सुनिश्चित करने में अभी संघर्षरत है। आज आवश्यकता है कि साइबर सुरक्षा को ‘लागत’ नहीं, ‘निवेश’ के रूप में देखा जाए। मजबूत जोखिम प्रबंधन ढांचा, त्वरित घटना प्रतिक्रिया प्रणाली, एआई-सक्षम सुरक्षा उपाय और आपूर्ति शृंखला की समग्र निगरानी अनिवार्य हो चुकी है। उद्योग, नियामकों और प्रौद्योगिकी प्रदाताओं के बीच रीयल-टाइम सूचना साझाकरण और स्पष्ट साइबर मानदंड स्थापित करना समय की मांग है। विशेषकर लघु और मध्यम उद्यमों के लिए कौशल उन्नयन और डेटा शासन की सुदृढ़ व्यवस्था अत्यंत महत्वपूर्ण होगी। साइबर लचीलापन तभी संभव है जब सुरक्षा रणनीति, संगठनात्मक संस्कृति और दैनिक संचालन में समाहित हो। भारत जब वैश्विक एआई नेतृत्व की दिशा में अग्रसर है और अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर डिजिटल नवाचार का दावा कर रहा है, तब उसे यह भी सुनिश्चित करना होगा कि उसकी डिजिटल नींव अभेद्य हो। साइबर सुरक्षा को प्राथमिकता देकर ही उद्योग जगत डिजिटल परिवर्तन की अपार संभावनाओं का सुरक्षित और टिकाऊ लाभ उठा सकता है। यही समय है- सजग होने का, समन्वित कार्रवाई का और भविष्य की रक्षा का।