भारत ने बदलती वैश्विक व्यवस्था की नब्ज पहचान ली है। जिस दौर में कृृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) दुनिया की अर्थव्यवस्था, राजनीति और समाज की दिशा तय कर रही है, उस समय देश की राजधानी में भारत मंडपम में आयोजित पांच दिवसीय इंडिया एआई समिट केवल एक सम्मेलन नहीं, बल्कि भारत की वैश्विक महत्वाकांक्षा की स्पष्ट उद्घोषणा है। सौ से अधिक बड़ी कंपनियों के सीईओ, करीब बीस देशों के राष्ट्राध्यक्ष और 135 देशों के प्रतिनिधियों की मौजूदगी यह साबित करती है कि भारत अब तकनीकी विमर्श का श्रोता नहीं, सूत्रधार बनना चाहता है। दुनिया का सबसे युवा देश आज डेटा और डिजिटल ऊर्जा से भरा हुआ है। स्टार्टअप संस्कृृति, तेजी से बढ़ता इंटरनेट उपभोग और विशाल मानव संसाधन- ये तीनों मिलकर भारत को एआई महाशक्ति बनने की ठोस जमीन दे रहे हैं। लेकिन प्रश्न केवल तकनीकी प्रभुत्व का नहीं है, प्रश्न है- क्या एआई भारत में आम नागरिक के जीवन को आसान, पारदर्शी और सुरक्षित बनाएगी? क्या यह किसान, छात्र, श्रमिक और छोटे उद्यमी के लिए अवसरों का नया द्वार खोलेगी, या केवल कॉरपोरेट मुनाफे का औजार बनकर रह जाएगी? आज विकसित और धनी राष्ट्र एआई को अपनी आर्थिक और सामरिक बढ़त का हथियार बना रहे हैं। एल्गोरिद्म के जरिए बाजारों पर कब्जा, डेटा के माध्यम से नियंत्रण और स्वचालन के नाम पर श्रम का विस्थापन- यह खतरनाक प्रवृत्ति वैश्विक असमानता को और गहरा कर सकती है। ऐसे समय में भारत से अपेक्षा है कि वह एआई को ‘शक्ति’ नहीं, ‘सार्वजनिक संपदा’ के रूप में परिभाषित करे। ग्लोबल साउथ के देश उम्मीद भरी निगाहों से देख रहे हैं कि भारत एक ऐसा मॉडल प्रस्तुत करे जो जवाबदेह, समावेशी और नैतिक हो। एआई की अंधी दौड़ में सबसे बड़ा खतरा है- नैतिकता का ह्रास। डीपफेक, डेटा चोरी, निगरानी की अति और एल्गोरिद्मिक पक्षपात- ये केवल तकनीकी खामियां नहीं, लोकतंत्र के लिए सीधी चुनौती हैं। यदि एआई पारदर्शी नहीं होगी, तो भरोसा खत्म होगा और भरोसा खत्म हुआ तो तकनीक का भविष्य भी संदिग्ध हो जाएगा। इसलिए यह अनिवार्य है कि एआई कंपनियों की जवाबदेही तय हो, डेटा सुरक्षा कानून कठोर हों और एल्गोरिद्म की पारदर्शिता सुनिश्चित की जाए। मुनाफे की अंधी दौड़ में मानवाधिकारों का गला घोंटना स्वीकार्य नहीं हो सकता। भारत के सामने एक और गंभीर चुनौती है- रोजगार। यह देश श्रम प्रधान अर्थव्यवस्था पर खड़ा है, जहां बेरोजगारी पहले से चिंता का विषय है। यदि एआई केवल स्वचालन का माध्यम बनकर नौकरियां निगलेगी, तो सामाजिक असंतोष बढऩा तय है। हमें ऐसी एआई चाहिए जो ‘जॉब किलर’ नहीं, ‘जॉब क्रिएटर’ बने। स्किलिंग, री-स्किलिंग और अप-स्किलिंग को राष्ट्रीय मिशन बनाना होगा। तकनीक तभी सार्थक है जब वह मानव क्षमता को बढ़ाए, न कि उसे अप्रासंगिक कर दे। इस समिट की असली सफलता तब मानी जाएगी जब यहां केवल घोषणाएं नहीं, ठोस नीतिगत संकल्प सामने आएं। भारत को चाहिए कि वह एआई के लिए एक वैश्विक आचार-संहिता प्रस्तावित करे- ऐसी संहिता जो लोकतांत्रिक मूल्यों, पारदर्शिता और सामाजिक न्याय पर आधारित हो। हमें यह स्पष्ट संदेश देना होगा कि एआई का भविष्य कुछ मु_ीभर कंपनियों के बोर्डरूम में तय नहीं होगा, बल्कि मानवता के साझा हितों के अनुरूप गढ़ा जाएगा। यह अवसर ऐतिहासिक है। दिल्ली का एआई कैपिटल बनना प्रतीकात्मक नहीं, निर्णायक होना चाहिए। भारत यदि इस क्षण को पहचान ले, तो वह केवल तकनीकी महाशक्ति नहीं, नैतिक नेतृत्वकर्ता के रूप में उभरेगा। लेकिन यदि हमने केवल तालियों और आंकड़ों से संतोष कर लिया, तो यह अवसर भी खो जाएगा। समय की मांग है- दूरदृष्टि, दृढ़ इच्छाशक्ति और कठोर निर्णय। एआई का भविष्य तय हो रहा है। प्रश्न यह है कि क्या भारत उसे दिशा देगा, या केवल उसका अनुसरण करेगा? इतिहास उनको याद रखता है जो परिवर्तन की आंधी में नेतृत्व करते हैं। अब बारी भारत की है।
भारत में एआई का साम्राज्य