एक दशक पूर्व जब प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना (पीएमएफबीवाई) की शुरुआत हुई थी, तब इसे भारतीय कृषि व्यवस्था के लिए ऐतिहासिक सुरक्षा कवच बताया गया था। वर्ष 2016 में इसे लागू करते समय सरकार ने दावा किया था कि अब प्राकृृतिक आपदाओं, अनियमित मानसून, ओलावृष्टि और बाजार की अस्थिरता से जूझते किसान को न्यूनतम सुरक्षा सुनिश्चित की जाएगी। सदियों से प्रकृति की मार झेलते अन्नदाता को पहली बार एक व्यवस्थित जोखिम प्रबंधन ढांचा मिलने जा रहा था। उद्देश्य स्पष्ट था—किसान हित सर्वोपरि, लेकिन दस वर्ष बाद जब इस योजना का मूल्यांकन किया जा रहा है, तो तस्वीर उत्साहजनक नहीं, बल्कि चिंताजनक दिखाई देती है। आंकड़े संकेत दे रहे हैं कि जिस योजना को किसान कल्याण का आधार बनना था, वह बीमा कंपनियों के लिए लाभ का सशक्त  माध्यम बन गई है। यह प्रश्न अब केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि नैतिक और आर्थिक जवाबदेही का भी है। हरियाणा का उदाहरण ही पर्याप्त है। वर्ष 2023 से 2025 के बीच बीमा कंपनियों ने 2,827 करोड़ रुपये का सकल प्रीमियम एकत्र किया, जबकि किसानों को दावों के रूप में मात्र 731 करोड़ रुपए का भुगतान हुआ। अर्थात 2,000 करोड़ रुपये से अधिक की राशि कंपनियों के पास शुद्ध लाभ के रूप में बची। यह केवल एक राज्य का आंकड़ा है। राष्ट्रीय स्तर पर स्थिति और अधिक चौंकाने वाली है—तीन वर्षों में 82,015 करोड़ रुपए  प्रीमियम के रूप में एकत्रित हुए, जबकि दावों के रूप में 34,799 करोड़ रुपये ही वितरित किए गए। 47,000 करोड़ रुपये से अधिक का अंतर आखिर किसकी कीमत पर है? यह विडंबना ही है कि जिस योजना का उद्देश्य किसानों को जलवायु परिवर्तन और बाजार जोखिम से बचाना था, वही योजना उनके लिए निराशा का कारण बनती जा रही है। कई स्थानों से दावों के निपटान में देरी,आंशिक भुगतान या दावों को खारिज किए जाने की शिकायतें सामने आई हैं। हरियाणा के कुछ हिस्सों में किसान धरना देने को विवश हुए। राजस्थान में जाली फॉर्म और फर्जी बैंक खातों के माध्यम से अनियमितताओं के आरोप लगे। यदि योजना की प्रक्रिया ही संदिग्ध हो जाए तो उसका नैतिक आधार कमजोर पड़ जाता है। यह भी ध्यान रखना चाहिए कि पीएमएफबीवाई के अंतर्गत किसान द्वारा दिया जाने वाला प्रीमियम अत्यंत कम है क्योंकि शेष राशि केंद्र और राज्य सरकारें वहन करती हैं। यानी प्रीमियम का बड़ा हिस्सा करदाताओं के धन से आता है। जब सार्वजनिक धन से संचालित योजना में प्रीमियम और दावों का अनुपात इतना विषम दिखाई दे, तो पारदर्शिता और जवाबदेही की मांग स्वाभाविक है। सरकार ने इस योजना को तकनीकी रूप से सशक्त बनाने के लिए सैटेलाइट इमेजरी, ड्रोन सर्वेक्षण और तकनीक आधारित उपज अनुमान प्रणाली को शामिल करने की बात कही थी। उद्देश्य था—मानवीय त्रुटियों और स्थानीय दबावों को कम करना। परंतु यदि तकनीक का लाभ अंतिम किसान तक नहीं पहुंच रहा, यदि दावों के भुगतान में महीनों लग रहे हैं, तो तकनीकी सुधार केवल कागजी उपलब्धि बनकर रह जाएंगे। यह समय आत्ममंथन का है। यदि बीमा कंपनियां लगातार भारी लाभ अर्जित करती रहें और किसान को पर्याप्त राहत न मिले, तो स्वाभाविक है कि किसानों का इस योजना से भरोसा उठ जाएगा। और जब भरोसा टूटता है, तो सबसे अधिक नुकसान उसी व्यवस्था को होता है जिसने इसे बनाया। अब जबकि पीएमएफबीवाई अपने ग्यारहवें वर्ष में प्रवेश कर रही है, इसे सुधारों की ठोस दिशा चाहिए। पारदर्शी और स्वतंत्र ऑडिट अनिवार्य किए जाएं। दावों के निपटान की समय-सीमा कानूनी रूप से बाध्यकारी हो। बीमा कंपनियों के लाभ-हानि अनुपात को सार्वजनिक किया जाए। राज्य और जिला स्तर पर किसान प्रतिनिधियों को निगरानी तंत्र में शामिल किया जाए और सबसे महत्वपूर्ण—निष्पक्ष प्रतिस्पर्धा सुनिश्चित की जाए ताकि योजना किसी एक या कुछ कंपनियों की मुनाफाखोरी का साधन न बने। देश की खाद्य सुरक्षा और किसान की आजीविका दांव पर है। फसल बीमा योजना को दुधारू गाय नहीं, बल्कि वास्तविक सुरक्षा कवच बनाना ही होगा। अन्यथा यह महत्वाकांक्षी पहल इतिहास के पन्नों ं में एक और अधूरा वादा बनकर रह जाएगी।