दिल्ली में आयोजित वैश्विक एआई सम्मेलन के दौरान ग्रेटर नोएडा स्थित गलगोटिया यूनिवर्सिटी द्वारा विदेशी रोबोट को अपनी खोज बताने के दावे ने देश की तकनीकी साख पर अनचाहा प्रश्नचिन्ह लगा दिया। भले ही बाद में सफाई दी गई हो, परंतु इस घटनाक्रम ने यह स्पष्ट कर दिया कि वैश्विक प्रतिस्पर्धा के दौर में ‘दिखावे की दौड़’ कितनी घातक हो सकती है। जब भारत स्वयं को ग्लोबल साउथ का प्रौद्योगिकीय नेतृत्वकर्ता बताने की स्थिति में खड़ा है, तब ऐसे प्रपंच राष्ट्रीय प्रतिष्ठा को आंच ही पहुंचाते हैं। आज कृृत्रिम बुद्धिमत्ता और रोबोटिक्स केवल तकनीकी शब्द नहीं, बल्कि सामरिक, आर्थिक और सामाजिक शक्ति के प्रतीक बन चुके हैं। संयुक्त राज्य अमरीका और चीन ने दशकों की निरंतर शोध-परंपरा, निवेश और संस्थागत पारदर्शिता के बल पर इस क्षेत्र में अपनी मजबूत पकड़ बनाई है। भारत ने भी पिछले वर्षों में उल्लेखनीय प्रगति की है। अंतर्राष्ट्रीय आकलनों में एआई अनुसंधान और स्टार्टअप इकोसिस्टम के मामले में भारत अग्रणी देशों में गिना जा रहा है। देश के युवा वैज्ञानिकों और इंजीनियरों की प्रतिभा पर कोई संदेह नहीं है। किंतु प्रश्न यह है कि क्या हम गुणवत्ता और मौलिकता के प्रति उतने ही प्रतिबद्ध हैं जितने कि प्रचार और प्रस्तुति के प्रति? यदि कोई संस्थान विदेशी उत्पाद को अपना नवाचार बताने का दुस्साहस करता है, तो यह केवल प्रशासनिक लापरवाही नहीं, बल्कि शोध संस्कृृति की कमजोरी का संकेत है। आज के डिजिटल युग में किसी भी तकनीकी दावे की सत्यता कुछ ही मिनटों में जांची जा सकती है। ऐसे में अल्पकालिक प्रसिद्धि की चाह दीर्घकालिक विश्वसनीयता को नष्ट कर सकती है। भारत की वास्तविक शक्ति उसकी जनसांख्यिकीय क्षमता और ज्ञान-संपन्न युवा वर्ग है। देश के हर भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) में रोबोटिक्स और एआई प्रयोगशालाएं सक्रिय हैं। स्टार्टअप संस्कृृति ने नवाचार को नई गति दी है। कृृषि, स्वास्थ्य, शिक्षा और विनिर्माण जैसे क्षेत्रों में एआई आधारित समाधान विकसित हो रहे हैं। यह वह सकारात्मक तस्वीर है, जिस पर हमें गर्व करना चाहिए। परंतु गर्व का आधार प्रामाणिक उपलब्धियां हों, न कि उधार की चमक। एआई और रोबोटिक्स के विस्तार के साथ एक अन्य चुनौती भी जुड़ी है- रोजगार। भारत श्रम-प्रधान अर्थव्यवस्था रहा है। ऐसे में तकनीकी उन्नति को ‘नौकरी छीनने वाली’ नहीं, बल्कि ‘नौकरी सृजित करने वाली’ दिशा में ले जाना होगा। इसके लिए कौशल विकास, पुन:प्रशिक्षण और उद्योग-शिक्षा संस्थानों के बीच तालमेल अनिवार्य है। यदि तकनीक का उपयोग उत्पादकता बढ़ाने और नए अवसर बनाने में किया जाए, तो यह जनशक्ति को बोझ नहीं, संपदा में बदल सकती है। सरकार और नियामक संस्थाओं की भी जिम्मेदारी कम नहीं है। किसी भी अंतर्राष्ट्रीय मंच पर भागीदारी के लिए संस्थानों की पृष्ठभूमि और दावों की जांच आवश्यक है। पारदर्शिता और जवाबदेही ही वो आधार हंै, जिन पर वैश्विक विश्वास निर्मित होता है। केवल सम्मेलन आयोजित कर लेना पर्याप्त नहीं, उससे जुड़ी प्रत्येक प्रस्तुति देश का प्रतिनिधित्व करती है। नि:संदेह, कृृत्रिम मेधा आने वाले वर्षों में राष्ट्रों की शक्ति-संतुलन को निर्धारित करेगी। भारत के पास प्रतिभा है, बाजार है और आकांक्षा भी। आवश्यकता है तो केवल सुदृढ़ शोध बुनियाद, नैतिक प्रतिबद्धता और दीर्घकालिक दृष्टि की। हमें यह समझना होगा कि विश्व मंच पर प्रतिष्ठा अर्जित करना कठिन है, पर उसे खोना अत्यंत आसान। यदि हम प्रपंच के बजाय प्रामाणिकता को अपना पथप्रदर्शक बनाएं, तो भारत न केवल एआई महाशक्ति बनने की दिशा में अग्रसर होगा, बल्कि वैश्विक विश्वास का भी केंद्र बनेगा। यही समय है- दिखावे से आगे बढक़र सच्चे नवाचार की राह चुनने का तभी देश उन्नति के पथ पर अग्रसर होगा और हम विकास का एक नया अध्याय लिख सकेंगे।
प्रपंच से प्रतिष्ठा तक