पूर्वोत्तर भारत के नागरिकों के साथ होने वाली अभद्रता और नस्लीय भेदभाव की घटनाएं कोई नई बात नहीं हैं। यह स्थिति केवल सामाजिक असंवेदनशीलता का परिणाम नहीं, बल्कि हमारे सामूहिक विवेक पर लगा कलंक है। जब नरेन्द्र मोदी ने पूर्वोत्तर को ‘हमारे विविधता के राष्ट्र में सबसे विशिष्ट क्षेत्र’ बताया, तो यह केवल राजनीतिक वक्तव्य नहीं था, बल्कि उस सांस्कृृतिक संपदा की स्वीकृृति थी, जो भारत को वास्तव में भारत बनाती है। दुर्भाग्य कि व्यावहारिक धरातल पर यह सम्मान अक्सर दिखाई नहीं देता। साल 2014 में नीदो तानिया की हत्या ने पूरे देश को झकझोर दिया था। इसके वर्षों बाद भी मानसिकता में अपेक्षित परिवर्तन नहीं दिखता। हाल ही में त्रिपुरा के छात्र अंजेल चकमा की देहरादून में हत्या और दिल्ली में अरुणाचल प्रदेश की तीन महिलाओं के साथ अपमानजनक व्यवहार इस बात के प्रमाण हैं कि समस्या अब भी गहरी जड़ें जमाए हुए है। उन्हें ‘धंधेवाली’ कहकर संबोधित करना और मोमो बेचने जैसी टिप्पणी करना केवल शब्दों का आघात नहीं, बल्कि पहचान और गरिमा पर सीधा प्रहार है। विडंबना यह है कि यह अभद्रता किसी क्षणिक आवेश का परिणाम नहीं थी, बल्कि पूर्वाग्रह से उपजी सोच का परिचायक थी। कुछ लोग अब भी शारीरिक बनावट, खान-पान और भाषा के आधार पर भारतीयों को बांटने का दुस्साहस करते हैं। यह मानसिकता उस विचार के बिल्कुल विपरीत है, जो ‘सबका साथ, सबका विकास’ की बात करता है। यदि विकास की अवधारणा में सम्मान और समानता शामिल नहीं, तो वह अधूरी है। भारत की विशेषता उसकी विविधता में निहित है। कोस-कोस पर भाषा और पानी बदलने वाला यह देश विभिन्न संस्कृृतियों का संगम है। पूर्वोत्तर की भौगोलिक स्थिति, जलवायु और सामाजिक संरचना ने वहां के लोगों के रहन-सहन और व्यक्तित्व को विशिष्ट स्वरूप दिया है। कई राज्यों में स्त्री-प्रधान सामाजिक व्यवस्था और सार्वजनिक जीवन में महिलाओं की सशक्त भूमिका को संदेह की दृष्टि से देखना अज्ञान का परिचायक है। इसी अज्ञान से नकारात्मक धारणाएं जन्म लेती हैं, जिनका खामियाजा विशेष रूप से महिलाओं को भुगतना पड़ता है। देश का संविधान प्रत्येक नागरिक को समान अधिकार देता है। क्षेत्रीय पहचान के आधार पर भेदभाव न केवल संवैधानिक मूल्यों का उल्लंघन है, बल्कि सामाजिक सौहार्द के लिए भी घातक है। सामाजिक श्रेष्ठता का दावा करना, राजनीतिक संबंधों का रौब दिखाना और किसी को उसकी कथित ‘औकात’ बताना उस सामंती मानसिकता का द्योतक है, जो लोकतांत्रिक भारत में अस्वीकार्य होनी चाहिए। दिल्ली की घटना में पीडि़त पक्ष के वकील, जो सिक्किम से हैं, का यह कथन-‘हम भी उतने ही भारतीय हैं, जितने कोई और’- दरअसल पूरे पूर्वोत्तर की वेदना का स्वर है। समस्या केवल कानून से हल नहीं होगी। यद्यपि दोषियों के विरुद्ध कठोर कार्रवाई आवश्यक है, पर उससे भी अधिक जरूरी है मानसिकता में बदलाव। शैक्षणिक संस्थानों, मीडिया और सामाजिक संगठनों को मिलकर संवेदनशीलता बढ़ाने की पहल करनी होगी। विद्यालयों में भारत की विविध संस्कृृतियों के प्रति सम्मान की शिक्षा दी जानी चाहिए। भारत की बहुलता उसकी शक्ति है, कमजोरी नहीं। यदि हम अपने ही देशवासियों को बेगाना ठहराएंगे, तो ‘एक भारत, श्रेष्ठ भारत’ का स्वप्न अधूरा रह जाएगा। समय की मांग है कि हम पूर्वाग्रहों की दीवारें तोड़ें और यह स्वीकार करें कि भारत की पहचान किसी एक चेहरा, भाषा या संस्कृृति से नहीं, बल्कि उन सभी से मिलकर बनती है जो इसे अपना घर मानते हैं। प्रत्येक भारतीय को देश के किसी भी कोने में गरिमा और सुरक्षा के साथ जीवन जीने का अधिकार है-और इस अधिकार की रक्षा करना हम सबकी सामूहिक जिम्मेदारी है।
नस्लीय भेदभाव?