मकर संक्रांति 2022 : सूर्य का एक राशि से दूसरी राशि में प्रवेश करना संक्रांति कहलाता है, इसी प्रकार सूर्य के मकर राशि में प्रवेश करने को मकर संक्रांति के नाम से जाना जाता है। मकर संक्रांति के दिन देव भी धरती पर अवतरित होते हैं, आत्मा को मोक्ष प्राप्त होता है, अंधकार का नाश व प्रकाश का आगमन होता है। इस दिन पुण्य, दान, जप तथा धार्मिक अनुष्ठानों का अनन्य महत्व है। इस दिन गंगा स्नान व सूर्योपासना पश्चात गुड़, चावल और तिल का दान श्रेष्ठ माना गया है। मकर संक्रांति के दिन ही सूर्य दक्षिणायन से उत्तरायण होते हैं। यह दिन अत्यंत महत्वपूर्ण होता है। कहा जाता है कि सूर्य के इस बदलाव से व्यक्ति की कार्यक्षमता में वृद्धि होती है। इसके अलावा इस दिन से रात छोटी और दिन बड़ा होने लगता हे। यहां रात के छोटे होने से अंधकार कम होने और दिन के बड़े होने से प्रकाश में वृद्धि होने की बात कही गई है। यही वजह है कि सूर्य के इस परिवर्तन यानी कि मकर संक्रांति के दिन को अंधकार से प्रकाश की ओर बढ़ना भी कहते हैं। गीता के आठवें अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण द्वारा भी सूर्य के उत्तरायण का महत्व स्पष्ट किया गया है। श्रीकृष्ण कहते हैं कि ऐसे लोग जिन्हें ब्रह्म का बोध हो गया हो, अग्निमय ज्योति देवता के प्रभाव से जब छह माह सूर्य उत्तरायण होता है, दिन के प्रकाश में अपना शरीर त्यागते हैं, पुनः जन्म नहीं लेना पड़ता है। वेदशास्त्रों के अनुसार, प्रकाश में अपना शरीर छोड़नेवाला व्यक्ति पुनः जन्म नहीं लेता, जबकि अंधकार में मृत्यु प्राप्त होने वाला व्यक्ति पुनः जन्म लेता है। यहां प्रकाश एवं अंधकार से तात्पर्य क्रमशः सूर्य की उत्तरायण एवं दक्षिणायन स्थिति से ही है। संभवतः सूर्य के उत्तरायण के इस महत्व के कारण ही पितामह भीष्म ने अपना प्राण तब तक नहीं छोड़ा, जब तक मकर संक्रांति अर्थात सूर्य की उत्तरायण स्थिति नहीं आ गई। सूर्य के उत्तरायण का महत्व छांदोग्य उपनिषद में भी किया गया है। इस प्रकार स्पष्ट है कि सूर्य की उत्तरायण स्थिति का बहुत ही अधिक महत्व है। सूर्य के उत्तरायण होने पर दिन बड़ा होने से मनुष्य की कार्य क्षमता में भी वृद्धि होती है जिससे मानव प्रगति की ओर अग्रसर होता है। प्रकाश में वृद्धि के कारण मनुष्य की शक्ति में भी वृद्धि होती है और सूर्य की यह उत्तरायण स्थिति चूंकि मकर संक्रांति से ही प्रारंभ होती है, यही कारण है कि मकर संक्रांति को पर्व के रूप में मनाने का प्रावधान हमारे भारतीय मनीषियों द्वारा किया गया और इसे प्रगति तथा ओजस्विता का पर्व माना गया जो कि सूर्योत्सव का द्योतक है। देवताओं की दिशा में सूर्य के गमन के दिवस को शास्त्रों में दान-पुण्य के कार्यों और स्नान के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण माना जाता है। इस दिन लोग स्नान के साथ कई वस्तुएं दान करते हैं। मान्यता है कि मकर संक्रांति पर किया गया दान आपको फल के रूप में सौ गुना वापस होकर प्राप्त होता है। इसलिए दान-पुण्य के इस शुभ अवसर को गंवाए बिना अपनी क्षमता के अनुरूप हम सभी को कुछ न कुछ दान जरूर करना चाहिए।