हमारे सामने सबसे बड़ी चुनौती प्रदूषण की है। दुनियाभर में इस पर बात हो रही है तो कई जगह छोटे-छोटे स्तर पर भी व्यापक प्रयास हो रहे हैं। ऐसे ही एक शख्स हैं सुरेंद्र बैरागी। छत्तीसगढ़ के रहने वाले हैं और नो पॉलीथिन यूज को लेकर एक मुहिम चला रखी है। पहला प्रयास उन्होंने अपने परिवार से ही किया है। वहां उन्होंने ‘नो पॉलीथिन’ रूल लगाया हुआ है। वह एक बर्तन बैंक भी चलाते हैं। उनका प्रयास है कि ज्यादा से ज्यादा लोग प्लास्टिक के उपयोग से बच सकें। एक न्यूज एजेंसी से बात करते हुए 52 साल के सुरेंद्र कहते हैं, मैं लोहे की फैक्ट्री में क्लर्क का काम करता हूं। 2014 से पर्यावरण के लिए काम कर रहा हूं। पीएम मोदी की बातों से प्रभावित होकर पर्यावरण के लिए काम शुरू किया। 2019 में बैग की जगह कपड़े की थैली का उपयोग करने के बारे में सोचा। इसके लिए पत्नी से सहायता मांगी। इसके बाद घर में पड़े हुए पुराने कपड़ों के उपयोग से उन्होंने थैले बनाने का काम शुरू किया। इस तरह उन्होंने 50 थैले बनाए। इसके बाद जन-जन में प्लास्टिक के वैकल्पिक माध्यम के तौर पर थैले के इस्तेमाल के लिए लोगों को जागरूक करने के प्रयास में लग गए। सुरेंद्र बैरागी कहते हैं, कि सबसे पहले क्षेत्रीय स्कूल में पहुंचे और बच्चों को प्लास्टिक के कम उपयोग के विषय में जागरूक किया। पर्यावरण को प्लास्टिक से बचाने के लिए स्कूल में बच्चों की निबंध प्रतियोगिता का आयोजन करवाया। इसमें जीतने वाले प्रतिभागियों को बढिय़ा क्वालिटी के कपड़े के थैले इनाम के रूप में दिए। बच्चों को जागरूक किया और उन्हें घरों में ‘नो पॉलीथिन’ के लिए जागरूक किया। वह कहते हैं, अपने साथियों के साथ मिलकर बाजार में जा-जाकर लोगों को मुफ्त के थैले बांटे और बाजार लाने का आग्रह किया। इससे उन्होंने प्लास्टिक के उपयोग को काफी हद तक कम करने की कोशिश की। कोरोना काल के दौरान लोगों को मास्क भी बांटे। घर में रात-रात भर जागकर बिना प्लास्टिक वाले सिंगल यूज मास्क बनाए। साथ ही लोगों को मुफ्त में बांटे। वह रोज घर से जहां भी जाते हैं चाहे मार्केट हो कोई कार्यक्रम हो या कुछ भी हो। लोगों को प्लास्टिक के उपयोग को रोकने की बात कहना नहीं भूलते। अपने इस जुनून से उन्होंने परिवार के साथ-साथ आस-पड़ोसियों के भी प्लास्टिक के उपयोग पर नियंत्रण लगाने में सफलता हासिल की है।
प्लास्टिक का विकल्प है ‘बर्तन बैंक’