शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती को भू-समाधि दे दी गई और इसके साथ ही लोगों के जेहन में यह सवाल उठा कि आखिरकार ये भू-समाधि होती क्या है? हिंदू धर्म में इसकी जगह है भी की नहीं ? हिन्दू मान्यताओं के मुताबिक अमूमन व्यक्ति को जलाया जाता है, लेकिन साधु संत के मामलों में दाहसंस्कार की प्रक्रिया अलग है। उन्हें जलाया नहीं जाता बल्कि भू-समाधि दी जाती है। 

क्यों दी जाती है भू-समाधि 

सनातन धर्म में देहांत के बाद दाह संस्कार किया जाता है जबकि बच्चे को दफनाया जाता है और साधुओं को समाधि  दी जाती है। इसके पीछे भी कई तर्क हैं। माना जाता है कि साधु और बच्चों का तन और मन निर्मल रहता है। साधु और बच्चों में आसक्ति नहीं होती है। शास्त्रों के अनुसार पांच वर्ष के लडक़े और सात वर्ष की लडक़ी का दाह संस्कार नहीं होता है। उन्हें शवासन की अवस्था में  दफनाया जाता है। वहीं दूसरी मान्यता है कि संन्यासी बनने से पहले व्यक्ति खुद का पिंडदान कर देता है, इसलिए उनकी आत्मा शरीर से दूर हो जाती है। इसलिए उन्हें जलाने की जरूरत नहीं होती। उन्हें जमीन के अंदर पद्मासन या सिद्धिसन की अवस्था में दफनाया जाता है। माना जाता है की यह परंपरा 1,200 साल से भी ज्यादा पुरानी है। आदि गुरु शंकराचर्य ने भी भू-समाधि ली थी, और केदारनाथ में उनकी समाधि आज भी मौजूद है। 

कैसे देते हैं भू-समाधि 

भू-समाधि में पद्मासन या सिद्धिसन की मुद्रा में बिठाकर जमीन में दफना दिया जाता है। शैव, नाथ, दशनामी, अघोर परंपरा के साधु-संतों को भू-समाधि देते हैं। गिरि शैव पंथ के दसनामी संप्रदाय से संबंध रखते हैं। अक्सर गुरु की समाधि के बगल में ही शिष्य को भू-समाधि दी जाती है। नरेंद्र गिरि को भी प्रयागराज में उनके मठ के अंदर अपने गुरु की समाधि के बगल में भू-समाधि दी थी। समाधि मठ में या किसी खास जगह पर दी जाती है।