गुवाहाटी : असम के कोने-कोने में रहने वाले आदिवासी लोगों ने अपने अधिकारों को प्राप्त करने और उनके ज्वलंत मुद्दों को हल करने की दिशा में एक कदम आगे बढ़ाया है। पिछले कई दशकों से एकतरफा संघर्ष विराम पर चल रहे विद्रोही समूह असम में शांति की हरी झंडी दिखाते हुए बातचीत की मेज पर एक साथ आए हैं। केंद्र और राज्य सरकार ने उग्रवादी समूहों की समस्याओं को चरणबद्ध तरीके से हल करने के लिए कदम उठाए हैं। एनडीएफबी के बाद अब कई आदिवासी उग्रवादी संगठन अब सरकार के साथ शांतिवार्ता के लिए कदम बढ़ाए हंै। वृहस्पतिवार को केंद्र सरकार के प्रस्ताव के अनुसार आकमा, बीसीएफ, एसटीएफ, आनला तथा आपा के करीब 1200 नेता व सदस्य शांति के मार्ग पर लौट आए हैं। असम में आदिवासी युवा लंबे समय से सरकार के खिलाफ अपने हाथों में आग्नेयास्त्रों लेकर आदिवासीकरण और आदिवासी समुदायों के ज्वलंत मुद्दों के समाधान की मांग कर रहे हैं। लंबे अरसे से सरकार के साथ एकतरफा बातचीत और युद्धविराम की घोषणा के बाद वृहस्पतिवार को पहली बार शांति समझौते पर हस्ताक्षर किए गए। गुरुवार शाम 5 बजे दिल्ली के नॉर्थ ब्लॉक में पांच संगठनों के साथ उनके सहयोगी संगठनों ने गृहमंत्री अमित शाह और मुख्यमंत्री डॉ. हिमंत विश्व शर्मा की उपस्थिति में शांति समझौते पर हस्ताक्षर किए। उल्लेखनीय है कि राज्य में आदिवासी समुदाय के विकास के लिए तथा इनकी समस्याओं को सुलझाने के लिए 7 जुलाई 1996 में आदिवासी कोबरा मिलिट्री ऑफ असम (आकमा)की स्थापना हुई थी। इसी तरह, 11 फरवरी, 2005 को अन्य एक सशस्त्र संगठन आपा, 30 जून, 1996 को बीसीएफ और 30 जून, 2005 को एसटीएफ की स्थापना हुई थी। गुरुवार को इन संगठनों के कुछ 16 नेताओं ने केंद्र सरकार के साथ समझौते पर हस्ताक्षर किए। उम्मीद की गई है कि इस शांति समझौते से अब तक सड़क, शिक्षा, परिवहन, सरकारी आवास,स्वास्थ्य, प्रकाश आदि से वंचित आदिवासी लोगों का विकास होगा।