हर साल 5 जून को विश्व पर्यावरण दिवस के तौर पर मनाया जाता है। विश्व पर्यावरण दिवस मनाने का उद्देश्य प्रकृृति के दोहन और पर्यावरण प्रदूषण को रोकना है। लोगों को जागरूक करना है कि प्रकृृति और पर्यावरण को कैसे संरक्षित किया जाए। उन्हें बताया जाए कि प्रकृृति हमें जीवन जीने के लिए सभी जरूरी चीजें देती है, तो इसके बदले में हमें इस प्रकृृति को संरक्षित करना है, ताकि आने वाली पीढ़ी को भी जीने के लिए जल, वायु, मृदा, पेड़-पौधे सभी कुछ सही सलामत स्थिति में मिल सके। पर्यावरण को दूषित होने से बचाने के लिए कई तरह से लोग प्रयास कर रहे हैं। उड़ीसा के चिल्का झील से जो तस्वीरें सामने आईं हैं, वो सराहनीय हैं। झील को दूषित होने से बचाने के लिए कुछ युवा लोग अपने स्तर पर प्रयास कर रहे हैं। मछुआरों से लेकर स्थानीय महिलाएं तक चिल्का झील को बचाए रखने के लिए अपने अपने स्तर पर ऐसे कार्य कर रहे हैं, जो उनकी आजीविका का साधन भी बन गया है। चलिए देखते हैं ओडिशा के चिल्का लेक की ये तस्वीर, जो हर किसी के लिए बन रही प्रेरणा। ओडिशा में स्थित चिल्का झील एक लोकप्रिय पर्यटन स्थल है, जहां हर साल देश-विदेश से कई सैलानी आते हैं। इस झील में भारतीय उपमहाद्वीप से उडक़र लाखों प्रवासी पक्षी पहुंचते हैं। चिल्का लेक के आसपास बसे गांवों में 50 फीसदी से अधिक आबादी मछली पकडऩे के काम पर निर्भर करती है। लेकिन बढ़ते तापमान, बाढ़, चक्रवात और बाढग़्रस्त नदियों द्वारा जमा होने वाले गाद के कारण झील सिकुड़ रही है, जिसकी वजह से यहां रहने वालों की आजीविका खतरे में पड़ गई है। ऐसे में लोगों को वैकल्पिक रोजगार की खोज में बाहर निकलने पर मजबूर होना पड़ रहा है। दूसरे राज्यों में जाकर अपना जीवन बिताने को मजबूर हो गए हैं। लेकिन यहां के लोगों के सामने गंभीर आर्थिक और सामाजिक संकट को देखते हुए स्थानीय नागरिक समाज संगठनों के साथ ही स्थानीय लोगों ने पहल शुरू की है, ताकि रोजी रोटी के लिए लोगों को अपना घर छोडक़र बाहर न जाना पड़े। ये पहले जल संरक्षण, कायाकल्प और आजीविका सृजन पर केंद्रित है। यूनिसेफ के साथ मिलकर यूथ4वाटर की पहल से आसपास के गांवों के युवा झील से प्लास्टिक की बोतलों, कागज, डिब्बे और कांच आदि को निकालने का काम करते हैं। इतना ही नहीं, झील के आस पास बांस की घास उग गई है, जिससे मछली पकडऩे के लिए नौकाओं को दिक्कत आती है। ऐसे में भोजन के लिए लोगों को मछलियों की जगह पक्षियों के शिकार पर निर्भर होना पड़ रहा है। जो पर्यावरण और पक्षियों की प्रजाति के लिए भी घातक है। ऐसे में लोगों को जागरूक किया गया कि वह घास को साफ करके उससे हस्तशिल्प और फर्नीचर बनाने का काम करें। आजीविका के लिए महिलाएं बांस की घास से चटाई आदि बनाकर आजीविका के वैकल्पिक स्रोत के तौर पर काम करती हैं। पारिस्थितिक पर्यटन और बांस शिल्प जैसे वैकल्पिक रोजगार के साथ-साथ क्षेत्र के समृद्ध पक्षी जीवन के संरक्षण के महत्व पर जागरूकता बढ़ रही है।