उत्तर प्रदेश में किसानों को अब वैकल्पिक खेती की तरफ मोड़ा जा रहा है। जिस प्रकार से इस बार बरसात जुलाई तक काफी कम रही, उस प्रकार की स्थिति आगे भी बनने की आशंका है। इसको देखते हुए किसानों के लिए वैकल्पिक फसलों की तरफ रुख मोड़ा जा रहा है। इसका कारण जल संरक्षण है। दरअसल, पानी का 70 से 80 फीसदी उपयोग खेती में होता है। कहा भी गया है कि खेती पानी को छोड़ हर चीज की प्रतीक्षा कर सकती है। मसलन फसल को उसकी जरूरत के अनुसार पानी चाहिए ही चाहिए। पानी की इसी अहमियत के नाते कहा गया है, का वर्षा जब कृृषि सुखाने। चूंकि, खेती में पानी की सबसे अधिक जरूरत होती है। ऐसे में एक रिपोर्ट सामने आई है, जिसके तहत पिछले 5 सालों में 11 जिलों में धान की जगह 90 हजार हेक्टेयर में किसानों ने उरद, मूंग, तिल, बाजरा, मूंगफली और सोयाबीन की फसल लगाई। इसमें उन्हें सफलता भी मिली है। सरकार की ओर से कम पानी में उपज होने वाली फसलों के प्रति अब किसानों को भी जागरूक किया जा रहा है। सरकार इसके लिए राष्ट्रीय कृृषि विकास योजना के फसल विविधीकरण योजना के तहत जागरूकता अभियान चला रही है। वर्ष 2014-2015 से प्रमुख धान उत्पादक 11 जिलों को ध्यान में रखकर इस कार्यक्रम को शुरू किया। संबंधित जिलों के 90 हजार हेक्टेयर रकबे में किसानों ने धान की जगह उरद, मूंग, तिल, बाजरा, मूंगफली, सोयाबीन और सब्जियों की खेती से रिप्लेस किया। दलहन फसलों से बदलाव का असर भी दिखने लगा है। दरअसल, दलहन फसलें अपने नाइट्रोजन फिक्सेशन गुण के कारण ये भूमि के लिए संजीवनी होती हैं। साथ ही, ये प्रोटीन का स्रोत भी हैं। इस तरह ये जन और जमीन दोनों की सेहत के लिए भी मुफीद होती हैं। कृृषि वैज्ञानिकों का कहना है कि उरद और मूंग जैसी फसलें तो कम समय में हो जाती हैं। इस तरह इनके बाद किसान बाजार की मांग के अनुसार तीसरी फसल भी ले सकते हैं। इसी तरह अपने पौष्टिकता के लिए चमत्कारिक माना जाने वाला बाजरा एक मात्र ऐसी फसल है, जिसका परागण 45 डिग्री सेल्सियस तापमान पर भी हो जाता है। धान की तुलना में पानी इन सभी फसलों में कम लगता है। पिछले वर्षों में यूपी के मौसम में काफी बदलाव आया है। औसत बारिश में कमी के साथ-साथ बरसात की समय अवधि भी कम हो गई है। कम समय में अधिक बारिश के बाद सूखे का एक लंबा दौर चलता है। यह किसानों के लिए सबसे अधिक मुश्किलें खड़ी कर रहा है। एक रिसर्च के अनुसार, यूपी के बुंदेलखंड इलाके में पिछले 80 सालों में औसत बारिश 320 मिलीमीटर तक कम हो गई है। आने वाले सालों में विश्व के आठ बड़े देशों में कृृषि उत्पादन में गिरावट के संकेत हैं। उसमें भारत का स्थान सबसे ऊपर है। भारत में कृृषि उत्पादन करीब 29 फीसदी कम हो सकता है। वहीं, मैक्सिको में 26, आस्ट्रेलिया में 16, अमेरिका में 8, अर्जेनटीना में 2, दक्षिण पूर्व के देशों में 18 और रूस में 6 फीसद कृृषि उत्पादन घटने का अनुमान है।