उमसॉ (मेघालय): ‘बीज बम’ और पौधों से लैस भारतीय थलसेना की असम रेजिमेंट असम और अरुणाचल प्रदेश की सीमा से लगे जंगलों में वनों की कटाई और पारिस्थितिकी को नुकसान पहुंचाए जाने के खिलाफ लड़ाई में अग्रिम पंक्ति में रही है। सम रेजिमेंट की 134 इन्फैंट्री बटालियन (प्रादेशिक सेना) को जंगल वारियर्स भी कहा जाता है, जिसका गठन 20 सितंबर, 2007 को किया गया था। यह असम के सोनितपुर जिला स्थित नामेरी आधारित है। यह इकाई कोलकाता स्थित टीए समूह मुख्यालय के अधीन कार्य करती है। हाल में, जंगल वारियर्स ने यहां सातवें पूर्वोत्तर हरित शिखर सम्मेलन में भाग लिया। इसका आयोजन एनजीओ विबग्योर एनई फाउंडेशन द्वारा उत्तर पूर्वी पुलिस अकादमी (एनईपीए) में आयोजित किया गया, जिसे पूर्वोत्तर भारत के हरित मुद्दों के मामले में विशेषज्ञता हासिल है। शिखर सम्मेलन को संबोधित करते हुए केंद्रीय मंत्री राजकुमार रंजन सिंह ने कहा कि पूर्वोत्तर क्षेत्र में वन का दायरा 2019 की तुलना में 2021 में 1,020 वर्ग किलोमीटर कम हो गया है और अकेले मेघालय में प्राकृतिक आपदाओं, मानवजनित दबाव, विकासात्मक गतिविधियों तथा खेती के तरीके बदलने के कारण 73 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र को नुकसान पहुंचा है। सम्मेलन में 134 इन्फैंट्री बटालियन के कमांडिंग ऑफिसर कर्नल अमित पांडे ने पर्यावरण और आपदा प्रबंधन पर अपने व्याख्यान में कहा कि पूर्वोत्तर भारत हमेशा जैव विविधता का केंद्र रहा है। हालांकि, बढ़ती आबादी और जैविक दबाव के चलते, असम-अरुणाचल प्रदेश सीमा से सटे वन क्षेत्रों में अवैध रूप से वनों की कटाई की जा रही है। उन्होंने कहा कि अन्य पारिस्थितिकी कार्यबल इकाइयों की सफलता से प्रेरित होकर, असम सरकार ने पेड़ों की अवैध कटाई को रोकने और असम-अरुणाचल सीमा पर वनों को पूर्व स्थिति में लाने के लिए सेना की एक बटालियन स्थापित करने का प्रस्ताव रखा, जिसके बाद इसे केंद्र सरकार द्वारा फरवरी 2007 में मंजूरी दी गई। परियोजना अधिकारी लेफ्टिनेंट कर्नल प्रवीण होस्माने ने कहा कि इसकी स्थापना के बाद से, बटालियन ने 5,069 हेक्टेयर क्षेत्र में 79 लाख से अधिक पौधे लगाए हैं। उन्होंने कहा कि वित्त वर्ष 2022-23 में 212 हेक्टेयर क्षेत्र में अब तक चार लाख से अधिक पौधे लगाए जा चुके हैं। हवलदार बिनय दास ने कहा कि बीज बॉल या बीज बम एक ऐसा बीज होता है जो मिट्टी में लिपटा होता है, जो आमतौर पर मिट्टी, राख और खाद का मिश्रण होता है। यह गड्ढा खोदने की आवश्यकता को समाप्त करता है और बीज को कीड़ों एवं पक्षियों से बचाता है। इसे बोया जा सकता है और जमीन पर बिखेरा जा सकता है। आधुनिक वानिकी और पारिस्थितिकी प्रबंधन तरीकों को ध्यान में रखते हुए, बटालियन ने अपनी स्वयं की वर्मीकल्चर, अजोला (विभिन्न फसलों पर जैव उर्वरक के रूप में उपयोग किया जाता है) तथा बीज बॉल उत्पादन इकाइयां विकसित की हैं। अधिकारियों ने बताया कि बटालियन ने नामेरी में 248 विभिन्न औषधीय प्रजातियों के साथ एक हर्बल उद्यान और औषधीय पार्क भी स्थापित किया है तथा क्षेत्र को रसायन मुक्त क्षेत्र बनाने के लिए सिंथेटिक उर्वरकों पर निर्भरता बंद कर दी है। उन्होंने कहा कि बटालियन की अपनी नर्सरी हैं, जिनकी सालाना क्षमता 4.5 लाख पौधों की है।
असम-अरुणाचल सीमा पर हरित धरोहर की रक्षा कर रहे ‘जंगल वारियर्स’