डिजिटल डेस्क: करीब सात महीने बाद राजद्रोह कानून पर रोक लगाने के बाद, सुप्रीम कोर्ट ब्रिटिश काल के दंडात्मक कानून को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर आज सुनवाई हुई, 11 मई को एक अभूतपूर्व आदेश के तहत देशभर में सुप्रीम कोर्ट ने राजद्रोह के मामलों में सभी कार्यवाहियों पर तब तक के लिए रोक लगा दी थी।चीफ डी वाई चंद्रचूड़ और न्यायमूर्ति पी एस नरसिम्हा की पीठ ने कानून के खिलाफ एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया द्वारा दायर याचिका सहित 12 याचिकाओं पर सुनवाई के लिए लिस्टिंग किया है। IPC 124(A) के तहत अधिकतम सजा उम्रकैद का प्रावधान है,स्वतंत्रता के 57 साल पहले तथा आईपीसी बनने के लगभग 30 साल बाद, 1890 में इसे दंड संहिता में शामिल किया गया था,आजादी से पहले के कालखंड में बाल गंगाधर तिलक और महात्मा गांधी के खिलाफ प्रावधान का इस्तेमाल किया गया। सीजेआई एन वी रमण के नेतृत्व वाली पीठ ने आदेश दिया था कि एफआईआर कराने के अलावा, देशभर में राजद्रोह संबंधी कानून के तहत चल रही जांचों, लंबित मुकदमों और सभी कार्यवाहियों पर भी रोक रहेगी।पीठ का कहना हैं कि IPC 124(A)(राजद्रोह)की कठोरता मौजूदा सामाजिक परिवेश के अनुरूप नहीं है। एनसीआरबी के आंकड़ों के अनुसार, देश में 2015 से 2020 के बीच राजद्रोह के 356 मामले दर्ज किये गये और 548 लोगों को गिरफ्तार किया गया हैं,हालांकि इन छह साल की इस अवधि में राजद्रोह के सात मामलों में गिरफ्तार केवल 12 लोगों को दोषी करार दिया गया,शीर्ष अदालत ने 1962 में राजद्रोह कानून की वैधता को बरकरार रखा था और इसका दायरा सीमित करने का प्रयास किया था ताकि इसका दुरुपयोग नहीं हो।
राजद्रोह कानून पर 7 महीने बाद सुप्रीम कोर्ट में हुई सुनवाई