नई दिल्लीः त्रिपुरा, नगालैंड और मेघालय के लिए विधानसभा चुनाव की तारीखों का एलान हो चुका है। त्रिपुरा में 16 फरवरी और नगालैंड-मेघालय में 27 फरवरी को एक-एक चरण में मतदान होगा। तीनों ही राज्यों में 60-60 सदस्यीय विधानसभा है। शनिवार को त्रिपुरा विधानसभा चुनाव के लिए अधिसूचना भी जारी हो जाएगी। इसी के साथ नामांकन की प्रक्रिया भी शुरू हो जाएगी। त्रिपुरा में इस वक्त भाजपा की सरकार है। वहीं, नगालैंड में एनडीपीपी के नेफ्यू रियो मुख्यमंत्री हैं। मेघालय में एनपीपी के कोनराड संगमा सत्ता में हैं। दोनों राज्यों में भाजपा सत्ताधारी गठबंधन का हिस्सा है। लेकिन चुनाव नजदीक आते ही तीनों ही राज्यों में राजनीतिक समीकरण तेजी से बदलने लगे हैं। आइए जानते हैं कि तीनों ही राज्यों की सत्ता में शामिल भाजपा ने इस बार चुनाव के लिए क्या प्लान बनाया है? विपक्ष के पास कौन से मुद्दे हैं?
त्रिपुरा : यहां पिछली बार यानी 2018 चुनाव में भाजपा ने ऐतिहासिक जीत दर्ज की थी। भाजपा ने 25 साल से शासन कर रहे लेफ्ट-कांग्रेस को बेदखल किया था। इस जीत के नायक रहे तत्कालीन भाजपा प्रदेश अध्यक्ष बिप्लब देब को राज्य का मुख्यमंत्री बनाया गया था। हालांकि, 2022 में भाजपा ने देब की जगह मानिक साहा को राज्य की कमान सौंप दी। अब साहा पर भाजपा को सत्ता में वापसी कराने की जिम्मेदारी है। हालांकि, बीते कुछ महीनों से राज्य में सियासी उथल-पुथल जारी है। एक तरफ भाजपा ने 2018 में जीत दिलाने वाले बिप्लब कुमार देब को हटाकर मानिक साहा को मुख्यमंत्री बना दिया तो कई नेता पार्टी से अलग भी हो गए। भाजपा नेता हंगशा कुमार त्रिपुरा इस साल अगस्त में अपने 6,000 आदिवासी समर्थकों के साथ टिपरा मोथा में शामिल हो गए। वहीं, आदिवासी अधिकार पार्टी भाजपा विरोधी राजनीतिक मोर्चा बनाने की कोशिश कर रही है। इसके साथ ही कई नेता पार्टियां बदल रहे हैं। हमेशा एक-दूसरे की धुर विरोधी रही कांग्रेस और सीपीएम ने इस बार हाथ मिला लिया है। दोनों ही पार्टियों ने साथ मिलकर चुनाव लड़ने का एलान किया है।
मेघालय : 2018 में राज्य में नेशनल पीपुल्स पार्टी (एनपीपी) और भाजपा गठबंधन की सरकार बनी थी। कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी थी। हालांकि, बहुमत के आंकड़े से दूर रह गई थी। चुनाव में अलग-अलग लड़े एनपीपी-भाजपा ने गठबंधन किया। एनपीपी के कोनराड संगमा मुख्यमंत्री बने। यहां भी चुनाव से पहले राजनीतिक उथल-पुथल जारी है। यहां तक की गठबंधन सरकार चला रही एनपीपी और भाजपा के बीच भी दरारें दिख रही हैं। हाल ही में दो विधायक एनपीपी से इस्तीफा देकर भाजपा में शामिल हो गए। कहा जहा रहा है कि 2018 की तरह ही इस बार भी दोनों दल अलग-अलग चुनाव लड़ेंगे। भाजपा ने नए सिरे से मेघालय में संगठन खड़ा किया है। दूसरी पार्टियों के कई नेताओं को पार्टी में शामिल भी कराया है।
नगालैंड : 2018 के विधानसभा चुनाव से पहले सत्ताधारी नगा पीपुल्स फ्रंट (एनपीएफ) में दो टुकड़ों में बंट गई थी। बागियों ने नेशनलिस्ट डेमोक्रेटिक प्रोग्रेसिव पार्टी (एनडीपीपी) बनाई। पार्टी के बड़े नेता और राज्य के मुख्यमंत्री रहे नेफ्यू रियो बागी गुट के साथ चले गए। चुनाव से पहले एनपीएफ ने भाजपा से गठबंधन तोड़ लिया। भाजपा और एनडीपीपी ने मिलकर चुनाव लड़ा।एनडीपीपीको 17 तो भाजपा को 12 सीटों पर जीत मिली। गठबंधन सत्ता में आया और नेफ्यू रियो मुख्यमंत्री बने। नेफ्यू रियो के सीएम बनने के बाद 27 सीट जीतने वाली एनपीएफ के ज्यादातर विधायक एनडीपीपी में शामिल हो गए। इससे एनडीपीपी विधायकों का आंकड़ा 42 पर पहुंच गया। वहीं, एनपीएफ के केवल चार विधायक बचे। बाद में एनपीएफ ने भी सत्ताधारी गठबंधन को समर्थन दे दिया। मौजूदा समय में राज्य विधानसभा के सभी 60 विधायक सत्तापक्ष में हैं। इस बार यहां सीट बंटवारे में विवाद हो सकता है। भारतीय जनता पार्टी अभी ज्यादा सीटों की डिमांड कर रही है। यही कारण है कि चुनाव से पहले गठबंधन में दरार पड़ सकती है। नॉर्थ ईस्ट राज्यों की अच्छी जानकारी रखने वाले देबाशीष रॉय ने बताया कि तीनों ही राज्यों में भाजपा के सामने स्थानीय राजनीतिक चुनौतियां हैं। मसलन त्रिपुरा में कांग्रेस और सीपीएम का गठबंधन हो चुका है।
इसके अलावा टिपरा मोथा भी भाजपा के लिए बड़ी चुनौती बन सकती है। इस पार्टी में ज्यादातर नेता भाजपा से टूटकर मिल रहे हैं। नेताओं के बागी तेवर का नुकसान भी भाजपा को उठाना पड़ सकता है। मेघालय में असम के साथ सीमा विवाद मुद्दा बन सकता है। असम में अभी भाजपा की सरकार है, जबकि मेघालय में भी भाजपा सरकार के गठबंधन का हिस्सा है। स्थानीय स्तर पर विपक्ष इसे मुद्दा बना सकता है। सीमा विवाद के चलते कई बार हिंसक झड़प भी हो चुकी है। यहां टीएमसी भी भाजपा के लिए मुसीबत बन सकती है। टीएमसी ने भी बड़े पैमाने पर चुनाव के लिए तैयारी की है। भाजपा के सामने मौजूदा गठबंधन में पड़ी दरार भी बड़ी चुनौती है। भाजपा ने अभी 60 में से 40 सीटों की डिमांड कर दी है। यही कारण है कि मुख्यमंत्री और एनपीपी के नेता कोनराड संगमा ने अकेले चुनाव लड़ने का एलान कर दिया है। अब भाजपा और एनपीपी अलग-अलग ही चुनाव लड़ेंगी। नगालैंड में भी सीट बंटवारे को लेकर विवाद है। भाजपा ने 20 सीटों पर चुनाव लड़ने का फैसला किया है, जबकि बाकी 40 सीटें गठबंधन की अन्य पार्टियों को देने के लिए कहा है। यही कारण है कि यहां भी चुनाव से पहले भाजपा अलग-थलग पड़ती हुई दिख रही है। 2021 में सुरक्षाबलों की फायरिंग में मारे गए 21 आदिवासियों का मामला भी चुनाव के समय तूल पकड़ता दिख रहा है। ये भी नगालैंड में चुनावी मुद्दा बन सकता है। अभी यहां विधानसभा के सभी 60 सदस्य सरकार का हिस्सा हैं।