आज पूरी दुनिया एथेनॉल के उत्पादन पर जोर दे रही है। इसे वाहन और पर्यावरण को सुरक्षित रखने का एक जरिया माना जा रहा है। ऑटो-मोबाइल सेक्टर के लिए एथेनॉल जितना कारगर साबित हो रहा है, उतना ही किसानों की आय बढ़ाने में भी मददगार साबित होने वाला है। आपको बता दें कि एथेनॉल एक तरीके का ईंधन होता है, जिसे पेट्रोल में मिलाकर वाहनों में इस्तेमाल किया जाता है। केंद्र सरकार ने साल 2025 तक पेट्रोल में 20त्न एथेनॉल सम्मिश्रण का लक्ष्य निर्धारित किया है। भारत में ही नहीं, पूरी दुनिया में आज एथेनॉल का इस्तेमाल हो रहा है। आज के समय में इसे ग्रीन फ्यूल के नाम से जानने लगे हैं, जिसका मेन सोर्स गन्ना और मक्का है, हालांकि शर्करा वाली अन्य फसलें भी एथेनॉल प्रोड्यूस कर सकती हैं।

  एथेनॉल उत्पादन के लिए अनाज आधारित भट्टियों की स्थापना करने और पुरानी भट्टियों के विस्तार करने का प्रावधान किया गया था। साथ ही एथेनॉल बनाने के लिए चावल, गेहूं, जौ, मक्का, ज्वार जैसे शर्करा आधारित अनाजों का इस्तेमाल भी किया जा सकता है। आपको जानकर हैरानी होगी कि एथेनॉल का इस्तेमाल डीजल में सम्मिश्रण के लिए ही नहीं किया जाता, बल्कि वार्निश, पॉलिश, दवाओं के घोल, निष्कर्ष, ईथर, क्लोरोफॉर्म, आर्टिफिशियल कलर, साबुन, इत्र और फलों में खास महक पैदा करने वाले सोर्स के लिए भी किया जाता है। शराब के अलावा घाव को साफ करने वाले जीवाणुनाशक और लैब की कई रिसर्च में भी एथेनॉल सोल्यूशन का इस्तेमाल होता है। मरे हुए जीवों को संरक्षित करने और कई औषधियों में भी एथेनॉल का इस्तेमाल होता है। फिलहाल देश में धान और गन्ना से बने एथेनॉल उत्पादन को बढ़ावा दिया जा रहा है।

एथेनॉल कोई इको फ्रेंडली ईंधन के तौर पर देखा जा रहा है। डीजल पैट्रोल से होने वाले पर्यावरण प्रदूषण, महंगाई और वाहनों के इंजन की गर्मी जैसे समस्याओं से निपटने के लिए ही एथेनॉल सम्मिश्रण को कारगर बताया जाता है। रिपोर्ट की मानें तो एथेनॉल एमटीबीई जैसे घातक ईंधनों के बेहतर विकल्प के तौर पर काम करता है। रिपोर्ट की मानें तो एथेनॉल के इस्तेमाल से पर्यावरण में कार्बन मोनोऑक्साइड, कार्बन मोनोऑक्साइड, सल्फर डाइऑक्साइड और हाइड्रोकार्बन  का उत्सर्जन भी 35प्रतिशत कम होता है।