युवा पीढ़ी को पर्यावरण के प्रति जागरूक और संवेदनशील बनाने के लिए मध्यप्रदेश में पर्यावरण शिक्षा को स्नातक स्तर पर अनिवार्य विषय के तौर पर शामिल किया गया है। यूजीसी ने ग्रेजुएशन लेवल पर पर्यावरण शिक्षा की पढ़ाई के लिए गाइडलाइन भी जारी कर दी है। इसके बाद प्रदेश में भी पाठ्यक्रम में बदलाव किया गया है। स्नातक, स्नातकोत्तर कोर्स में अब पर्यावरण की प्राचीन ज्ञान परंपरा को शामिल किया गया है। साथ ही कोर्स में उसके फायदे और नुकसान के बारे में भी जानकारी दी गई है।

उच्च शिक्षा विभाग के अधिकारियों ने बताया कि अभी तक पर्यावरण विषय को एमएससी (बॉटनी, जूलॉजी, जियोग्राफी) के विद्यार्थी ही पढ़ते हैं, लेकिन राष्ट्रीय शिक्षा नीति के तहत पर्यावरण शिक्षा को स्नातक स्तर पर पढ़ाई का अहम हिस्सा बनाया गया है। ऐसे में अब बीए और बीकॉम में छात्र-छात्राएं भी पर्यावरण विषय पढ़ना जरूरी होगा। पर्यावरण शिक्षा में जलवायु परिवर्तन, प्रदूषण, वेस्ट मैनेजमेंट, स्वच्छता, वन और वन्य जीवन संरक्षण और सतत विकास जैसे क्षेत्रों को शामिल किया गया है।

ईकोसिस्टम, बायोडायवर्सिटी व प्रदूषण की समस्या को भी कोर्स में शामिल किया गया है। इससे निपटने के लिए क्या-क्या जरूरी कदम उठाए जा सकते हैं। छात्रों की क्या भूमिका हो सकती है।  जलवायु परिवर्तन का हम सब पर क्या असर हो रहा है, इसे भी जोड़ा गया है। छात्रों को राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय स्तर की केस स्टडी के बारे में भी पढ़ाया जाएगा। प्राचीन ज्ञान परंपरा के तहत कांक्रीट की जगह मिट्टी का उपयोग, रसायनों की जगह प्राकृतिक चीजों का उपयोग, बिना कैमिकल के पानी शुद्धीकरण और जैविक खेती आदि के बारे में विस्तार से जानकारियां कोर्स में शामिल की गई हैं।

राष्ट्रीय शिक्षा नीति लागू करने वाला मध्यप्रदेश पहला राज्य है। प्रदेश में दो साल पहले ही इसका ड्राफ्ट तैयार हो चुका है। कोर्स में पर्यावरण की प्राचीन ज्ञान परंपरा को शामिल किया गया है। इसमें छात्रों को होने वाले लाभ को भी शामिल किया गया है।