डिजिटल डेस्क: साल 2010 में केंद्र सरकार ने 1984 के भोपाल गैस त्रासदी के पीड़ितों का मुआवजा बढ़ाने के लिए क्यूरेटिव याचिका दायर की थी, जिसे आज यानी 14 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दिया हैं।केंद्र ने यूनियन कार्बाइड कॉरपोरेशन की उत्तराधिकारी कंपनियों से 7844 करोड़ रुपए का अतिरिक्त मुआवजा पीड़ितों को देने के लिए ये याचिका दायर की थी।सुनवाई पूरी होने के बाद 12 जनवरी को 5 जजों की संवैधानिक बेंच ने इस पर फैसला सुरक्षित रख लिया था,तथा याचिका खारिज करते हुए कोर्ट ने कहा कि इसे पहले आना चाहिए था न कि 2 दशक के बाद,इतने समय बाद इस मामले को उठाने का कोई मतलब नहीं है।अतिरिक्त मुआवजा देने के लिए केंद्र की याचिका का कोई कानूनी आधार नहीं बनता है।
अमेरिकी कंपनी के साथ 1989 में हुए समझौते के तहत मुआवजे के रूप में 715 करोड़ रुपए मिले थे,और केंद्र इसके अलावा 7844 करोड़ रुपए और चाहता था, जिसके लिए क्यूरेटिव याचिका दायर की गई थी। इस पर कोर्ट ने कहा कि या तो समझौता वैध था या धोखाधड़ी के मामलों में इसे रद्द किया जाए,केंद्र ने धोखाधड़ी की ऐसी कोई बात नहीं की। उनका एकमात्र विवाद कई लोगों के हताहत होना और लागतों से संबंधित है, जिन पर समझौते के समय विचार नहीं किया गया।
पीठ ने आगे कि यह पता था कि लोगों के पुनर्वास के लिए चिकित्सकीय सुविधाओं का विस्तार करना होगा और पर्यावरण को नुकसान होना तय था और वास्तव में, यूसीसी का आरोप है कि भारत सरकार और राज्य ने सक्रिय रूप से घटनास्थल को डिटॉक्सिफाई नहीं किया। किसी भी मामले में यह समझौते को रद्द करने की मांग करने का आधार नहीं हो सकता है,तथा केंद्र इस बात पर जोर देता रहा कि 1989 में मानव जीवन और पर्यावरण को हुई वास्तविक क्षति का ठीक से आकलन नहीं किया जा सका था।फैसला देते हुए बेंच ने ये भी कहा कि केंद्र सरकार भारतीय रिजर्व बैंक के पास मौजूद 50 करोड़ रुपए का उपयोग मुआवजा देने के लिए करे।
हादसे में गईं 3000 से ज्यादा जानें:
भोपाल में 1984 में 2 और 3 दिसंबर की रात को यूनियन कार्बाइड फैक्ट्री से जहरीली मिथाइल आइसोसाइनेट गैस का रिसाव हुआ था,तथा इससे 3000 से अधिक लोग मारे गए और 1,00,000 से अधिक लोग प्रभावित हुए। इससे पर्यावरण को भी काफी नुकसान पहुंचा था, जस्टिस संजय किशन कौल के नेतृत्व वाली 5 जजों की पीठ में जस्टिस संजीव खन्ना, जस्टिस अभय एस ओका, जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस जेके माहेश्वरी शामिल थे।