प्रदूषण दुनियाभर के लिए समस्या बना हुआ है, लेकिन भारत जैसे देशों में इसकी ज्यादा ही मार है। हमारे देश के शहरों में प्रदूषण की समस्या मानव जीवन के लिए बड़ी चुनौती बन कर उभरी है। तमाम प्रयासों के बावजूद शहरों का प्रदूषण घट नहीं रहा है। यह चिंता इसलिए भी बढ़ जाती है क्योंकि स्विस फर्म आइक्यूएयर की नवीन वर्ल्ड एयर रिपोर्ट के अनुसार दुनिया के सबसे प्रदूषित शहरों की सूची में 50 प्रदूषित शहरों में से 39 भारत के हैं।
हालांकि प्रदूषित देशों की रैंक में वर्ष 2022 में भारत का स्थान आठवां रहा, जबकि 2021 में यह पांचवें पायदान पर था। इसलिए यह तो माना जा सकता है कि भारत ने हालात में सुधार तो किया है, लेकिन शहरों की मौजूदा स्थिति से लगता है कि और सुधार की जरूरत है।
आम तौर पर ऐसी रिपोर्ट जारी होने के पीछे मकसद आईना दिखाने का रहता है। यह जानने का भी मकसद होता है कि अमुक देश व शहर ने वायु प्रदूषण के स्तर में सुधार के कितने प्रयास किए हैं। लेकिन, प्रदूषित शहरों में भारतीय शहरों की भरमार यह खुलासा करती है कि अभी व्यापक प्रयासों की दरकार है। शहरों में प्रदूषण का स्तर बढ़ता है तो इसका साफ अर्थ है कि ये मानवीय रहवास के लिए सुरक्षित नहीं हैं। अच्छे मानवीय जीवन के लिए जरूरी है कि शहरों की आबोहवा बेहतर होनी चाहिए। लेकिन, जिन शहरों में प्रदूषण की ज्यादा मार है, वहां बीमारियां भी हावी हो रही हैं। ज्यादातर शहरों की दिक्कत यह है कि प्रदूषण रोकने के लिए जितने प्रयास किए जाते हैं, उससे अधिक प्रदूषण के रास्ते भी खुले नजर आते हैं।
ऐसे में रोकथाम के प्रयास बेअसर दिखाई देते हैं। शहरों का बेतरतीब विस्तार, वाहनों की रेलमपेल और कारखानों से गैसों का उत्सर्जन आबोहवा बिगाड़ने के मुख्य कारकों में हैं, लेकिन इन पर सरकारी एजेंसियों का नियंत्रण नाकाफी नजर आता है। ये कारक न केवल प्रदूषण के लिए जिम्मेदार हैं, बल्कि शहर नियोजन के बिगड़े स्वरूप को भी दर्शाते हैं। यह बात सही है कि वाहनों से हो रहे प्रदूषण को रोकने के लिए इलेक्टि्रक वाहनों पर जोर दिया जा रहा है, लेकिन इस दिशा में अभी लंबी दूरी तय करनी होगी।