डिजिटल डेस्क: समलैंगिक विवाह को कानूनी मान्यता देने से जुड़ी याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट में मंगलवार को संविधान पीठ में सुनवाई हो रही है और इस दौरान समलैंगिक समूहों की ओर से वकील मुकुल रोहतगी ने दलील दी कि याचिकाकर्ताओं को सम्मान से जीने का अधिकार है और यह अधिकार संविधान ने दिया है। उन्होंने यचिकाकर्ताओं की ओर से मांग करते हुए कहा कि विवाह का अधिकार, राज्य सरकार से विवाह को मान्यता और अधिकार मिलना चाहिए।
वहीं कोर्ट ने बताया कि हमारे समाज ने सेम सेक्स रिलेशन को स्वीकार किया है और यह एक बड़ी उपलब्धि है और ऐसे में कुछ मुद्दों को भविष्य के लिए छोड़ा जा सकता है और इस मामले में सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई जारी हैl
केंद्र सरकार ने क्या कहा?
केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई पर आपत्ति जताई, और केंद्र के मुताबिक नए सामाजिक संबंध के निर्माण पर निर्णय लेने के लिए संसद एकमात्र संवैधानिक रूप से स्वीकार्य मंच है।
अदालत की कार्यवाही में भाग लेने वाले देश के विचारों का प्रतिनिधित्व नहीं करते हैं और अदालत को पहले यह जांच करनी चाहिए कि क्या अदालत इस मामले को सुन सकती है।
याचिकाकर्ताओं के वकील मुकुल रोहतगी ने क्या कहा?
377 हटाकर सुप्रीम कोर्ट ने समलैंगिकता को अपराध के दायरे से बाहर करने के बावजूद हालात जस के तस हैं और समलैंगिकों के साथ भेदभाव नहीं होना चाहिए।
समानता के अधिकार तहत विवाह को मान्यता मिलनी चाहिए क्योंकि सेक्स ओरिएंटेशन सिर्फ महिला-पुरूष के बीच नहीं, बल्कि समान लिंग के बीच भी होता है।
कानून में पति और पत्नी के बजाय जीवन साथी शब्द का इस्तेमाल किया जा सकता है.इससे संविधान की प्रस्तावना और अनुच्छेद 14 के मुताबिक समानता के अधिकार की भी रक्षा होती रहेगी, नालसा और नवतेज जौहर मामलों में सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बावजूद सरकार ने कुछ नहीं किया गया है।
देश की शीर्ष अदालत ने हमेशा अपनी पसंद के व्यक्ति से शादी करने के लिए अंतर-जातीय और अंतर-धार्मिक कपल के अधिकार की रक्षा की है।
समलैंगिक विवाह की गैर-मान्यता भेदभाव के बराबर थी जो LGBTQIA+ जोड़ों की गरिमा और आत्म-पूर्ति की जड़ पर आघात करती थी,LGBTQ+ नागरिक देश की जनसंख्या का 7 से 8% हिस्सा हैं।
SC बेंच और वकीलों के बीच सवाल जवाब:
सवाल– आपकी दलीलें सही हो सकती हैं ? लेकिन क्या हम हस्तक्षेप कर सकते हैं जब विधायिका भी उस पर विचार कर रही है?
मुकुल रोहतगी का जवाब– अदालतें हमारे अधिकारों की रक्षा के लिए हस्तक्षेप कर सकती हैं।
जस्टिस कौल का सवाल– क्या हम इस तरह का डिक्लेरेशन दे सकते हैं?
रोहतगी: हमारी जिंदगी कट रही है, हम जिंदगी भर विधायकी का इंतजार नहीं कर सकते और कुछ डिक्लेरेशन जिसकी हमें आवश्यकता है।
CJI: हम आपसे सहमत है. लेकिन क्या हम हस्तक्षेप कर सकते हैं जब विधायिका भी उस पर विचार कर रही है?
रोहतगी: अदालतें हमारे अधिकारों की रक्षा के लिए हस्तक्षेप कर सकती है।
CJI: हम सबकुछ नहीं तय कर सकते।
सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?
यह कोई ऐसा मुद्दा नहीं है जिस पर 5 इस तरफ के लोगों के साथ, 5 उस तरफ के लोगों के साथ और 5 सदस्यों की पीठ के साथ बहस की जा सकती हो तथा दक्षिण भारत में किसान, उत्तर भारत में बिजनेस मैन की क्या राय है कोई नहीं जानता।
पिछले 100 सालों में विवाह की अवधारणा बदल गई है और पहले हम बाल विवाह करते थे, कोई भी कितनी भी बार शादी कर सकता था – वह भी बदल गया।