डिजिटल डेस्क: सेम  सेक्स मैरिज के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने ब्रिटिश संसद से तुलना को लेकर आपत्ति जताई है, कोर्ट ने कहा है कि संसद के पास शादी और तलाक जैसे मुद्दों पर कानून बनाने के अधिकार हैं,और  इस दौरान कोर्ट समवर्ती सूची की प्रविष्टि 5 का हवाला दिया है। कोर्ट ने कहा कि इससे इनकार नहीं किया जा सकता है कि इन याचिकाओं में जो कैनवास शामिल हैं वह संसद के अधिकार क्षेत्र में आता है,तथा ऐसे में ब्रिटिश संसद का हवाला देना उचित नहीं है।

सेम सेक्स मैरिज के मामले में सुप्रीम कोर्ट की 5 सदस्यीय बेंच सुनवाई कर रही है जिसकी अध्यक्षता सीजेआई डीवाई चंद्रजूड़ कर रहे हैं। बेंच ने कहा है कि संविधान की सूची 3 की प्रविष्टि 5 के साथ पढ़े गए अनुच्छेद 346 के आधार ये तय किया जाता है कि कोर्ट किन मुद्दों पर हस्तक्षेप कर सकती हैं किन मामलों में नहीं. ऐसे में ब्रिटिश संसद से तुलना करना सही नहीं है.

बेंच में शामिल जस्टिस रविंद्र भट्ट ने कहा है कि अगर सांसदों पर एक सकारात्मक दायित्व डाला गया है तो अनुच्छेद 17 भी देखना चाहिए,और ऐसे में सवाल उठता है कि क्या कोर्ट कानून के निर्माण का अनुमान लगा सकते हैं?

 यह ऐसा मामला है जिसमें को नागरिक अधिकार अधिनियम नहीं तो ऐसे में हस्तक्षेप कैसे किया जाए और इस अधिकार को एक कानून के साथ जाना होगा और उन्होंने स्पष्ट किया कि कोई भी अधिकार अनुच्छेद 21 से बड़ा नहीं है।

सुनवाई के दौरान सीजेआई चंद्रजूड़ ने कहा कि पुत्तुस्वामी फैसले पर सवाल तब उठे थे जब आधार मामला सामने आया था, और तब अटॉर्नी जनरल मुकुल रोहतगी ने कहा था कि इसमें निजता का कोई अधिकार नहीं है, हालांकि इस मामले में वरिष्ठ अधिवक्ता मेनका गुरुस्वामी ने अदालत के सामने 5 अलग-अलग पहलू रखे।

उन्होंने कहा कि यह मामला संसद पर छोड़ना भारतीय संसद के विवश दृष्टिकोण के अनुरूप नहीं है और यह ब्रिटिश संसद को जो कि संप्रभु है थोपने जैसा है और उन्होंने कहा कि केंद यहां आकर यह नहीं कह सकता कि यह संसद का मामला है, क्योंकि मौलिक अधिकार बुनियादी ढांचे का हिस्सा हैं। 

इससे पहले याचिकाकर्ताओं की ओर से दिलालें पेश करने वालीं वकील गीता लूथरा ने अदालत में कहा था कि शादी एक जादुई शब्द है, और इसका असर पूरी दुनिया में हैऔर  उन्होंने आगे  कहा कि इसका हमारे सम्मान और जीवन जीने से जुड़े मामलों से है। लूथरा ने कोर्ट में कहा कि समलैंगिकों को शादी के अधिकार से वंचित रखना ठीक वैसे ही है जैसे कि महिलाओं के मतदान के अधिकार से वंचित रखना।