नई दिल्ली : महाराष्ट्र की सत्ता शिंदे के पास रहेगी या उद्धव के पास लौटेगी, सुप्रीम कोर्ट ने वृहस्पतिवार को ये विवाद निपटा दिया। सीजेआई डीवाई चंद्रचूड़ वाली 5 जजों की संविधान पीठ ने फैसला सुना दिया कि शिंदे सीएम बने रहेंगे। कोर्ट ने कहा कि उद्धव ठाकरे फ्लोर टेस्ट से पहले इस्तीफा न देते तो उनकी सरकार को बहाल कर सकते थे। सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में 5 बड़े सवालों के जवाब दिए, इसमें चार प्वाइंट उद्धव ठाकरे के पक्ष में हैं। सिर्फ एक वजह से उद्धव को वापस सत्ता नहीं मिलेगी और शिंदे सीएम बने रहेंगे। कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया कि राज्यपाल का फ्लोर टेस्ट कराने का फैसला गलत था। महाराष्ट्र में शिवसेना,कांग्रेस और एनसीपी के गठबंधन वाली महाविकास आघाड़ी सरकार चल रही थी। तभी 21 जून 2022 को शवसेना के ही एकनाथ शिंदे ने 15 विधायकों के साथ बगावत कर दी।
एक हफ्ते बाद ही यानी 28 जून को राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी ने मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे से बहुमत साबित करने के लिए कहा। शिवसेना ने राज्यपाल के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी, जिसमें कोर्ट ने रोक लगाने से इनकार कर दिया। इसके बाद उद्धव ठाकरे ने फ्लोर टेस्ट से पहले ही मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया। महाराष्ट्र के राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी ने जून 2022 में महाराष्ट्र विधानसभा में फ्लोर टेस्ट का आदेश नियम के तहत नहीं दिया था। विपक्षी दलों ने अविश्वास प्रस्ताव की कोई बात नहीं की। राज्यपाल के पास सरकार के विश्वास पर संदेह करने के लिए कोई ठोस जानकारी नहीं थी यानी न तो उनके पास कोई चिट्ठी थी न कोई ज्ञापन था। यह भी संकेत नहीं थे विधायक समर्थन वापस लेना चाहते हैं। अगर यह मान भी लिया जाए कि विधायक सरकार से बाहर होना चाहते थे तब उन्होंने केवल एक गुट का गठन किया था। ऐसे में फ्लोर टेस्ट का इस्तेमाल राजनीतिक पार्टी की आपसी कलह सुलझाने में नहीं किया जा सकता है।
पीठ ने कहा कि न तो संविधान और न ही कानून राज्यपाल को राजनीतिक क्षेत्र में प्रवेश करने और पार्टी के अंदर होने वाले विवादों में भूमिका निभाने का अधिकार देता है। राज्यपाल एक खास नतीजा निकलवाने के लिए अपने पद का इस्तेमाल नहीं कर सकते। उल्लेखनीय है कि महाराष्ट्र संकट के समय जब शिवसेना में फूट पड़ी तो शिवसेना ने व्हिप जारी कर सभी विधायकों को बैठक में पहुंचने का निर्देश दिया। इसके बाद बागी गुट के नेता एकनाथ शिंदे ने शिवसेना के चीफ व्हिप को अवैध बता दिया। शिंदे गुट राजनीतिक दल न होते हुए भी भरत गोगावले को चीफ व्हिप नियुक्त कर दिया। गोगावाले को शिवसेना पार्टी के चीफ व्हिप के रूप में नियुक्त करने का स्पीकर का फैसला अवैध था।
व्हिप को पार्टी से अलग करना ठीक नहीं है। स्पीकर को 3 जुलाई 2022 को विधायक दल में दो गुटों के उभरने के बारे में पता था, जब उन्होंने एक नया व्हिप नियुक्त किया था। स्पीकर ने यह पहचानने का प्रयास नहीं किया कि दो व्यक्तियों प्रभु या गोगावाले में से कौन सा राजनीतिक दल द्वारा ऑथराइज्ड व्हिप है। स्पीकर को सिर्फ राजनीतिक दल द्वारा नियुक्त व्हिप को ही मान्यता देनी चाहिए। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि वह शिंदे और 15 अन्य विधायकों को पिछले साल जून में तत्कालीन मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे के खिलाफ बगावत करने के लिए अयोग्य नहीं ठहरा सकता है। यह अधिकार स्पीकर के पास तब तक रहेगा, जब तक कि सुप्रीम कोर्ट की बड़ी बेंच इस फैसला नहीं सुना देती।