गुवाहाटी : असम सरकार ने 1975 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की ओर से लगाए गए आपातकाल का विरोध करने वाले व्यक्तियों को रविवार को सम्मानित किया। वहीं, असम के मुख्यमंत्री हिमंत विश्वशर्मा ने अफसोस जताया कि अध्यादेश पर हस्ताक्षर करने वाले तत्कालीन राष्ट्रपति और कांग्रेस के तत्कालीन अध्यक्ष असम से ताल्लुक रखते थे। उन्होंने यह भी कहा कि विपक्षी नेताओं, मीडिया, वकीलों और समाज के अन्य वर्गों के कड़े विरोध ने  सुनिश्चित किया है कि कोई भी शासन दोबारा इस तरह के प्रतिबंध लगाने के बारे में नहीं सोच सके। शर्मा यहां आपातकाल का विरोध करने वाले 300 'लोकतंत्र सेनानियों' और उनके परिजनों को सम्मानित करने के लिए आयोजित कार्यक्रम को संबोधित कर रहे थे।

उन्होंने देश के तत्कालीन राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद का जिक्र करते हुए कहा कि आदेश पर हस्ताक्षर करने वाले राष्ट्रपति असमिया थे। यह पहली बार था कि हमारे राज्य से एक व्यक्ति देश के राष्ट्रपति बना था, लेकिन उनके हाथ से आपातकाल के आदेश पर हस्ताक्षर किए गए। मुख्यमंत्री ने कहा कि तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष देवकांत बरुवा भी असम से ही ताल्लुक रखते थे। उन्होंने कहा कि आपातकाल देश के इतिहास में एक काला अध्याय था और लोकतंत्र के योद्धाओं ने   इसके खिलाफ इतनी दृढ़ता से लड़ाई लड़ी कि कोई भी शासन फिर से इस तरह के प्रतिबंध लगाने के बारे में नहीं सोच सकता। शर्मा ने कहा कि उनकी सरकार ने आपातकाल के दौरान बलिदान देने वाले राज्य के लोगों का सम्मान करने का फैसला किया है।

उन्होंने कहा कि हमारी कैबिनेट ने 'लोकतंत्र सेनानियों' के योगदान को मान्यता देने का निर्णय लिया था। हम उन 'लोकतंत्र सेनानियों' को 15,000 रुपए की मासिक पेंशन देंगे, जो अभी भी जीवित हैं या संबंधित व्यक्तियों की मृत्यु के मामले में उनकी पत्नी या अविवाहित बेटियों को पेंशन दी जाएगी। अब तक 91 लोग इस पेंशन के लिए मानदंडों को पूरा करते हैं। आपातकाल का विरोध करने वाले मामलों में 15 दिनों से अधिक की सजा दर्शाने वाले रिकॉर्ड के आधार पर 300 नामों की सूची तैयार की गई है। मुख्यमंत्री ने कहा कि अगर किसी पात्र व्यक्ति का नाम सरकारी सूची से छूट गया है तो उनका भी नाम बाद में शामिल किया जाएगा। गौरतलब है कि 1975 में आज ही के दिन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के नेतृत्व वाली तत्कालीन कांग्रेस सरकार द्वारा देश में आपातकाल लगाया गया था।