इंफाल : मेरा घर इंफाल घाटी में है। बचपन से लेकर जवानी तक यहीं बीती है। मैं जिस इलाके में रहता हूं, वहीं कुकी और नगा भी रहते हैं। हमारी उम्र के मैतई, कुकी और नगा बच्चे बचपन से साथ-साथ खेलकर पले और बढ़े, लेकिन वक्त के बदले हालातों ने न सिर्फ इन पड़ोसियों से रिश्ते खत्म कर दिए, बल्कि दुश्मनी जैसे हालात हो गए। कभी जिन पड़ोसियों के भरोसे हम लोग अपना घर छोड़कर नातेदारों के यहां चले जाते थे। वही लोग अब मौका देखकर हमारे घरों को आग के हवाले कर रहे हैं। हमारे पड़ोसियों ने ही हमारे घर जला दिए। मेरे माता-पिता, भाई-बहन समेत हम सभी लोग अब अपने एक रिश्तेदार के गांव में रह रहे हैं।  मणिपुर की इंफाल घाटी में रहने वाले हाओरोकचम ने कुछ इस प्रकार अपना दर्द  बयां किया। मैतई समुदाय के हाओरोकचम ने बताया कि 27 अप्रैल को वह इंफाल से वापस अपने गांव गए थे, क्योंकि बिगड़े हालातों के चलते तब से लेकर अब तक इंटरनेट की सेवाएं बदहाल हैं और घरवालों का हाल-चाल नहीं मिल रहा था।

हाओरोकचम के मुताबिक, हालात बीते कुछ समय से बिगड़ तो रहे थे, लेकिन इस तरह से आग लगाने वाले हालात होंगे, ऐसा उन्होंने सपने में भी नहीं सोचा था। उनका कहना है कि 3 मई से जब हालात ज्यादा बिगडऩे लगे तो उनको अपने आसपास रहने वाले कुकी और नगा परिवारों पर भरोसा इसलिए होने लगा, क्योंकि बचपन से वह इन लोगों के साथ पले बढ़े और साथ खेले कूदे थे। वह कहते हैं कि उनको पूरा भरोसा था कि बिगड़े हालातों में उनके पड़ोसी ही उनकी मदद करेंगे, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। भरभराती हुई आवाज में वह कहते हैं कि मेरे इन्हीं अपने पड़ोसियों ने बिगड़ते हुए हालात में मेरे घर को आग के हवाले कर दिया। उन्होंने बताया कि जब हालात बिगडऩे लगे तो वह अपने परिवार के साथ अपने घर में इस आसरे के साथ सुरक्षित महसूस करने लगे कि बाहर भले ही कुकी और नगा समुदाय मैतई को निशाना बना रहा है, लेकिन आसपास के रहने वाले लोग जिनके साथ उन्होंने अपनी पूरी जिंदगी गुजार दी, वह तो उनको बचा ही लेंगे।

कचम कहते हैं कि यह उनकी जिंदगी की बहुत बड़ी भूल साबित हुई है, क्योंकि यूनाइटेड नगा काउंसिल से जुड़े लोग एक-एक बस्ती में जाकर मैतई समुदाय से जुड़े लोगों को मार रहे थे और उनके घरों को आग के हवाले कर रहे थे। बढ़ते उपद्रव के दौरान जब उनके घर वालों को लगा कि वह इस दौरान यहां पर सुरक्षित नहीं रहेंगे वो लोग भी अपने परिवार के साथ कुछ जरूरी चीजें आभूषण और नकदी लेकर इंफाल घाटी के अपने रिश्तेदारों के गांव पहुंच गए। कुछ दिनों बाद उनके पड़ोस में रहने वाले उनके जानने वाले कुकी लोगों ने न सिर्फ उनके घर को आग लगाई, बल्कि उस बस्ती के सभी घरों को खाक कर दिया। वहीं दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़ाई कर रहे मणिपुर के छात्र खंगेबा पंजोहबम कहते हैं कि वह दिल्ली से 28 अप्रैल को मणिपुर सिर्फ इसीलिए गए थे, क्योंकि वहां पर हालात बिगडऩे जैसी सूचनाएं आ रही थी। वह कहते हैं कि अपने घर में सिर्फ वही अकेले सबसे बड़े हैं, इसलिए हालातों को देखते हुए उन्होंने दिल्ली से वापस मणिपुर ही जाना उचित समझा। 3 मई के बाद जिस तरीके से मणिपुर की सड़कों पर आगजनी और हत्याएं हुईं, उससे न सिर्फ वो बल्कि उनका पूरा परिवार अभी भी सदमे में है। खंगेबा कहते हैं कि मणिपुर के हालात को मणिपुर में झेल रहा यहां का आदमी ही समझ सकता है।

वो कहते हैं कि सड़कों पर जिस तरीके से कत्लेआम मचा हुआ है, लोगों के घरों को जलाया जा रहा है, ऐसा लग रहा है कि यह लड़ाई अपने देश के एक राज्य के दो समुदायों के बीच में नहीं, बल्कि दो दुश्मन देशों के बीच में हो रही है। उनका दावा है कि जिस तरीके के हालात मणिपुर में बने हुए हैं ऐसा देश के किसी भी राज्य में नहीं होता है। उनकी नाराजगी भी इसी बात से है कि न राज्य सरकार और न केंद्र सरकार को मणिपुर से कोई लेना-देना है। पंजोहबम कहते हैं कि हालात इस तरीके के हो गए हैं कि मणिपुर में हमारे घर के लोगों को जरूरत की चीजें भी मिलनी मुश्किल हो रही है। जिन इलाकों में कफ्र्यू लगा है, वहां पर तो घर से बाहर नहीं निकलने दिया जा रहा है और जहां पर कफ्र्यू नहीं लगा है, वहां पर हालातों के चलते बाहर नहीं निकला जा रहा है। यहां पर अभी इस तरीके के हालात बने हैं, उससे यह बिल्कुल नहीं लग रहा है कि स्थितियां बहुत जल्द सुधरने वाली हैं।

दिल्ली में मणिपुर स्टूडेंट वेलफेयर एसोसिएशन से ताल्लुक रखने वाले छात्र देबोन कहते हैं कि जिस तरीके के हालातों में मणिपुर को छोड़ दिया गया है, उसे केंद्र सरकार के लिए नाराजगी तो उठती है। क्या हम लोग भारत के नागरिक नहीं हैं, जो हमारे राज्य को जलता हुआ छोड़ा जा रहा है। वो कहते हैं कि इस पूरे मामले में देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को आगे आ कर हमारे जलते हुए राज्य को बचाना होगा। वह कहते हैं कि उनका भरोसा प्रधानमंत्री मोदी की उस अपील में है जो मणिपुर को जलने से और पूरी तरह तबाह होने से बचा सकती है। उनका कहना है कि जलते हुए मणिपुर को बचाने के लिए जल्द से जल्द केंद्र सरकार को उचित प्रयास तो करने ही होंगे। उनका कहना है कि बेकाबू होते हालातों में मणिपुर ही नहीं, बल्कि आसपास के राज्यों तक में हालात बिगड़ सकते हैं।