डिजीटल डेस्क: क्या महाराष्ट्र के बाद अब बिहार की बारी है? शरद पवार के साथ जो हुआ अब वही नीतीश कुमार के साथ हो सकता है? जेडीयू के अजित पवार कौन बनने वाले हैं? बीजेपी नेताओं का दावा है कि अब बिहार में भी खेला होने वाला है। माहौल ऐसा बनाया जा रहा है कि जेडीयू अब बस टूटने वाली है। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार पिछले चार दिनों से लगातार अपनी पार्टी के विधायकों और सांसदों से बारी-बारी से मिल रहे हैं। आगे वे जेडीयू के पदाधिकारियों से भी मिलने वाले हैं और  बस मुलाकातों के इस सिलसिले के बहाने ही बीजेपी ने बिहार में सरकार बदलने की खबर फैला दी है।

महाराष्ट्र में एनसीपी में बगावत होने के बाद से ही बीजेपी नेताओं का जोश हाई है और वे शरद पवार की तरह ही नीतीश कुमार के खिलाफ भी बगावत की भविष्यवाणी कर रहे हैं। मैसेज ये दिया जा रहा है कि विपक्षी एकता तो बस नारा है और अगर शरद पवार जैसे ताकतवर नेता की पार्टी टूट सकती है तो फिर नीतीश कुमार की जेडीयू क्यों नहीं! बीजेपी वाले आरजेडी और जेडीयू के अनबन को भी हवा दे रहे हैं। जब तक बिहार में जेडीयू और बीजेपी के गठबंधन वाली सरकार रही, नीतीश कुमार के सबसे भरोसेमंद साथी सुशील मोदी बने रहे तथा अब नहीं कह रहे हैं नीतीश की पार्टी तो गई।

बीजेपी सांसद सुशील मोदी का दावा है कि आने वाले दिनों में कुछ भी हो सकता है और वे कहते हैं कि जब से नीतीश ने राहुल गांधी के नेतृत्व में तेजस्वी को अपना उत्तराधिकारी बनाया है तब से उनकी पार्टी में खलबली मची है। नीतीश कुमार और चिराग पासवान के रिश्ते तो जगजाहिर हैं, लोक जन शक्ति पार्टी के चिराग कहते हैं कि जेडीयू के कई नेता उनके संपर्क में हैं। हम के नेता और बिहार के पूर्व सीएम जीतन राम मांझी ने जेडीयू के टूटने का भविष्यवाणी कर दी है और विरोधियों के दावों को जेडीयू के अध्यक्ष ललन सिंह मुंगेरीलाल के हसीन सपने बता रहे हैं।

जेडीयू में टूट की गुंजाइश कम:

महाराष्ट्र में हुए राजनीतिक उलटफेर के बाद से ही बिहार में भी जेडीयू में बगावत की चर्चा तेज हो गई है, पर ये बस एक चर्चा भर है और ये फिर इस खबर में कोई दम है। इसको विस्तार से समझते हैं तथा अमित शाह ने 2024 के लोकसभा चुनाव के लिए तीन सौ सीटों का लक्ष्य रखा है। बीजेपी का केंद्रीय नेतृत्व बिहार, बंगाल और महाराष्ट्र को लेकर चिंतित है और महाराष्ट्र के लिए शिवसेना और एनसीपी में ऑपरेशन लोटस हो गया है।

क्या अब जेडीयू कैंप में भी ऐसा ही ऑपरेशन बीजेपी कर सकती है, लेकिन सवाल ये उठता है कि जेडीयू में बीजेपी के लिए अजित पवार या एकनाथ शिंदे कौन बन सकते हैं और  मोदी सरकार में मंत्री और कभी नीतीश के राइट हैंड रहे आर सी पी सिंह जेडीयू से निकले तो उनका साथ पार्टी के एक भी विधायक ने नहीं दिया। संख्या बल के हिसाब से पार्टी में टूट की गुंजाइश कम है। बिहार में आरजेडी, जेडीयू, कांग्रेस और लेफ्ट वाले महागठबंधन की सरकार है।

जेडीयू में नीतीश ही सब कुछ:

243 विधायकों वाली बिहार विधानसभा में बीजेपी गठबंधन के पास सिर्फ 82 एमएलए हैं और बहुमत के लिए 122 विधायकों का समर्थन जरूरी है। आरजेडी के 79 और जेडीयू के 45 विधायक हैं तथा बिहार में विधानसभा चुनाव 2025 के आखिर में हैं। ऐसे में जेडीयू का कोई भी विधायक सरकार से अलग होने का रिस्क अभी क्यों लेगा? पार्टी में टूट के लिए दो तिहाई मतलब 30 एमएलए चाहिए।

जेडीयू में नीतीश ही सब कुछ हैं. वही पार्टी हैं और पार्टी का संविधान भी है और  उनके बाद किसी नेता की ऐसी हैसियत नहीं है कि वो जेडीयू तोड़ने की हिम्मत कर सकें। तीसरी बड़ी बात ये है कि जेडीयू विधायकों को लगता है विधानसभा चुनाव तो आरजेडी के साथ लड़ने में ही फायदा है। पिछड़ों की गोलबंदी और मुस्लिम वोट के दम पर सत्ता में लौटने की गारंटी है तथा 2015 के बिहार चुनाव के नतीजे तो यही कहते हैं।

जेडीयू के कुछ विधायक आरजेडी के साथ गठबंधन से खुश नहीं हैं और इसमें पार्टी के कुछ सांसद भी शामिल हैं। ऐसे नेताओं पर ही बीजेपी की नजर है,इन्हीं नेताओं के भरोसे बीजेपी ऑपरेशन लोटस का दम भर रही है। जेडीयू नेताओं की नाराजगी के पीछे की तीन बड़ी वजहें हैं।

जेडीयू नेताओं की नाराजगी की ये तीन वजहें हैं:

1. आरजेडी के साथ गठबंधन को जेडीयू के महा दलित और अति पिछड़ी बिरादरी के वोटर अब तक कबूल नहीं कर पाए हैं और बिहार में पिछले कई दशकों से ये जातियां यादवों के वर्चस्व के खिलाफ ही लड़ती रही हैं। गोपालगंज और कुढ़नी का विधानसभा उप चुनाव इसी वजह से गठबंधन हार गई तथा आरजेडी और जेडीयू का एक दूसरे में वोट ट्रांसफर नहीं हो पा रहा है।

2. नीतीश कुमार ने तेजस्वी यादव को अपना राजनीतिक उत्तराधिकारी घोषित कर दिया है तथा 2024 के लोकसभा चुनाव के बाद नीतीश पर तेजस्वी को सीएम बनाने का जबरदस्त दवाब होगा।  अब ऐसे में नीतीश के बाद जेडीयू का भविष्य क्या होगा? जेडीयू के विधायकों की ये सबसे बड़ी चिंता है।

3. जंगलराज और भ्रष्टाचार को लेकर पिछले बीस सालों से आरजेडी के खिलाफ जेडीयू लड़ती रही है और अब चुनाव में किस मुंह ये आरजेडी के साथ जनता के बीच जाएगी।

बिहार में बीजेपी के लिए चुनौती:

पिछले लोकसभा चुनाव में एनडीए ने बिहार में विपक्ष का सफाया कर दिया था और तब नीतीश कुमार बीजेपी के साथ थे। बिहार की 40 में से 39 लोकसभा सीटें एनडीए को मिली थीं और आरजेडी का खाता तक नहीं खुला था और कांग्रेस को सिर्फ एक सीट मिली थी। तब जेडीयू को 17, बीजेपी को 16 और राम विलास पासवान की लोक जन शक्ति पार्टी को 6 सीटें मिली थीं और इस बार बीजेपी की सबसे बड़ी चुनौती बिहार में पिछले प्रदर्शन को दुहराने की है।