नई दिल्ली : आजादी से सिर्फ 4 साल पहले 1943 में अविभाजित भारत में भयंकर अकाल पड़ा। बंगाल में फैले इस भीषण अकाल में लगभग 50 लाख लोग भूख से मर गए। इस दौरान कलकत्ता और ढाका की सड़कें नरकंकालों से भर गई थीं। सड़कों पर लोगों की लाशें गिद्ध और आवारा जानवर खाते थे। अकाल के दौरान अपनी भूख मिटाने के लिए लोगों ने घास से लेकर सांप तक खाए। इस अकाल को झेल चुके कुछ बुजुर्ग आज भी इसकी खौफनाक कहानियां सुनाते हैं। अब मौजूदा वक्त में देश में उगे अनाज और फल सब्जियों का 40 प्रति. हिस्सा थाली में पहुंचने से पहले ही खराब हो जाता है। पश्चिमी देशों की तरह भारत में भी किसी भी फल या सब्जी के एक हिस्से को खाने और बाकी को फेंक देने का चलन बढ़ा है। बहुत पुरानी बात नहीं है जब देश में चोकर की रोटी और आम की गुठली की सब्जी खाई जाती थी, लेकिन अब ये चीजें ‘फूड वेस्ट’ की कैटेगरी में आ गई हैं। उन्नत मशीनों और रसायनिक खाद के जरिए ज्यादा फसल उगाना आने वाले वक्त में धरती के लिए संभव नहीं होगा।
धरती के अनाज पैदा करने की ताकत और समुद्र से मछलियां दोनों कम हो रही हैं। ऐसे में थाली में आने से पहले बर्बाद होने वाला 40 प्रति. अनाज दुनिया का पेट भरने में मददगार साबित हो सकता है। यही वजह है कि इन दिनों दुनिया भर में उन चीजों को खाने का चलन बढ़ा है, जिसे पिछले कुछ दशकों के दौरान ‘फूड वेस्ट’ कहकर फेंक दिया जाता रहा है। इसी क्रम में बीयर बनाने के बाद बचे अनाज के आटे से लेकर समुद्री काई और छिलकों तक को खाने के आइटम में बदलने की बातें हो रही हैं। सन 1798 में थॉमस मैलथस नाम के एक अंग्रेज अर्थशास्त्री ने भविष्य में खाने की कमी को लेकर एक थ्योरी सामने रखी। उनका कहना था कि आबादी 2 से 4, 4 से 8 और 8 से 16 के अनुपात में बढ़ती है। जबकि अन्न की उत्पादकता 2 से 3, 3 से 4, 4 से 5 के अनुपात में बढ़ती है। ऐसे में जब धरती की आबादी सबसे ज्यादा होगी, बड़ी आबादी के पास खाने को कुछ भी नहीं होगा। अल्कोहोलिक ड्रिंक बीयर जौ और मक्का जैसे अनाज से बनाई जाती है। बीयर बनाने के बाद बचे ‘मॉल्टेड अनाज’ को आमतौर पर फेंक दिया जाता है। अब अमरीका और यूरोप की कुछ कंपनियों ने ऐसे बचे हुए अनाज का आटा बनाना शुरू किया है। इस आटे से रोटी, केक, बिस्किट और चिप्स जैसी चीजें बनाई जा रही हैं।
डायटीशियंस की राय में बियर के बाइप्रोडक्ट से बना आटा कई मायनों में ज्यादा फायदेमंद हो सकता है। इसमें बीयर बनने के दौरान आटे का ज्यादातर कार्बोहाइड्रेट निकल जाता है। बचा हुआ आटा प्रोटीन से भरपूर होता है। यही वजह है कि इस आटे को ‘सुपर आटा’ कहा जा रहा है। हालात यह हैं कि अब पश्चिमी देशों में ये आटा आम आटे से ज्यादा कीमत पर बिक रहा है। ‘आम तो आम, गुठलियों के दाम’ जैसी कहावत शायद किसी ने गुठली की सब्जी चखने के बाद ही कही होगी। कुछ दशक पहले तक देश अमरीका से आने वाले लाल गेहूं पर निर्भर था और नागरिकों के पास पेट भरने के लिए अनाज नहीं था। इस दौर में आम के सीजन में गरीब लोग गुठलियां इकट्ठा करते। इन्हें अच्छे से सुखाने के बाद गुठली का अंदरूनी मुलायम हिस्सा निकाल लिया जाता। इसे फिर से सुखाया जाता, ताकि इसमें कोंपल न निकले। फिर इस सूखे हिस्से की सब्जी या पीसकर आटा बनाया जाता। आज गुठली को देर तक चूसना भी कंगाली की निशानी मानी जाती है।
इस दौर में गुठली की सब्जी और गुठली के आटे का दौर लौटना इस पीढ़ी को किसी बुरे सपने जैसा न लगे। वैसे आम की गुठली को खाना सुनने में भले ही अटपटा लगे, लेकिन यह एनल्जेसिक और प्रोटीन से भरपूर होती है। जो पीरियड्स के दौरान होने वाली प्रॉब्लम्स को कम करने में भी मदद करती है। दुनिया भर में अनाज, सब्जियों, डेयरी प्रोडक्ट और मीट की उत्पादकता बढ़ने के साथ ही इसकी बर्बादी भी बढ़ी है। लोग सब्जी के सबसे पसंदीदा हिस्से को खाते और बाकी फेंक देते हैं। अमीर समझे जाने वाले पश्चिमी देशों में आजकल ‘चिकन ब्रेस्ट’ का कॉन्सेप्ट आया है। इसी तरह मछली के भी चुनिंदा हिस्सों को खाने और बाकी को फेंकने का चलन बढ़ा है। दूसरी ओर, दुनिया भर की कई नदियां मछलियों से खाली हो गई हैं।