नई दिल्ली : संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद पर सवाल उठाते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा है कि यह विसंगति का प्रतीक है। हम इसे वैश्विक निकाय का प्राथमिक अंग कैसे मान सकते हैं, जब अफ्रीका और लैटिन अमरीका के पूरे महाद्वीपों को नजरअंदाज कर दिया जाता है? संयुक्त राष्ट्र दुनिया की तरफ से बोलने का दावा कैसे कर सकता है जब उसका सबसे अधिक आबादी वाला देश और उसका सबसे बड़ा लोकतंत्र इसका स्थायी सदस्य नहीं है? इसकी निर्णय लेने की प्रक्रिया अपारदर्शी है। आज की चुनौतियों से निपटने में यह असहाय दिखती है। प्रधानमंत्री ने फ्रांसीसी समाचार पत्र लेस इकोस को दिए साक्षात्कार में कहा कि इस बदली हुई दुनिया में कई सवाल उठते हैं। क्या संयुक्त राष्ट्र आज की दुनिया का प्रतिनिधित्व करता है? क्या वह उन भूमिकाओं का निर्वहन करने में सक्षम है जिनके लिए उसे स्थापित किया गया था? क्या दुनिया भर के देशों को लगता है कि ये संगठन मायने रखते हैं या ये प्रासंगिक हैं?
प्रधानमंत्री ने चीन कीआक्रामकता के बारे में पूछे गए एक सवाल पर फ्रांसीसी समाचार पत्र लेस इकोस को दिए साक्षात्कार में कहा कि भारत हमेशा वार्ता और कूटनीति के माध्यम से मतभेदों के शांतिपूर्ण समाधान और सभी देशों की संप्रभुता का सम्मान करने का पक्षधर रहा है। चीन के बारे में यह पूछे जाने पर कि क्या रक्षा क्षमताओं में उसके भारी निवेश से क्षेत्र की सुरक्षा को खतरा है, मोदी ने कहा कि भारत जिस भविष्य का निर्माण करना चाहता है, उसके लिए शांति जरूरी है। उन्होंने कहा कि हिंद-प्रशांत क्षेत्र में हमारे व्यापक हित हैं और हमारे संबंध गहरे हैं। मैंने इस क्षेत्र के लिए हमारे दृष्टिकोण का एक शब्द में वर्णन किया है - सागर, जो इस क्षेत्र में सभी के लिए सुरक्षा और विकास से जुड़ा है। हम जिस भविष्य का निर्माण करना चाहते हैं, उसके लिए शांति जरूरी है, लेकिन यह सुनिश्चित नहीं है। रूस-यूक्रन संघर्ष पर प्रधानमंत्री ने कहा कि उन्होंने रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमिर जेलेंस्की से कई बार बात की है और इस संघर्ष को समाप्त करने में मदद करने वाले सभी वास्तविक प्रयासों का समर्थन करने की भारत की इच्छा को रेखांकित किया है। उन्होंने कहा कि भारत का रुख स्पष्ट, पारदर्शी और सुसंगत रहा है। मैंने कहा है कि यह युद्ध का युग नहीं है। हमने दोनों पक्षों से बातचीत और कूटनीति के माध्यम से मुद्दों को हल करने का आग्रह किया है।
प्रधानमंत्री ने कहा कि मैं भारत को इतना मजबूत कंधा मानता हूं कि अगर ग्लोबल साउथ को ऊंची छलांग लगानी है तो भारत उसे आगे ले जाने के लिए अपने कंधे का सहारा दे सकता है। ग्लोबल साउथ के लिए भारत ग्लोबल नॉर्थ के साथ भी अपने संबंध बना सकता है। इसलिए, इस लिहाज से यह कंधा एक तरह का पुल बन सकता है। उन्होंने कहा कि जरूरत इस बात की है कि इस कंधे व पुल को मजबूत किया जाए ताकि उत्तर और दक्षिण के बीच संबंध मजबूत हो सकें और ग्लोबल साउथ खुद मजबूत हो सके। यह पूछे जाने पर कि क्या वह भारत को ग्लोबल साउथ का स्वाभाविक नेता मानते हैं, मोदी ने इस सुझाव को तवज्जो नहीं दी और कहा कि विश्व का नेता काफी भारी शब्द है और उनके देश को कोई पद नहीं चाहिए।
चीन के साथ गतिरोध में रणनीतिक समर्थन के संदर्भ में फ्रांस से भारत की उम्मीदों के बारे में पूछे जाने पर मोदी ने कहा कि हिंद-प्रशांत क्षेत्र सहित दोनों देशों के बीच साझेदारी किसी देश के खिलाफ या उसकी कीमत पर नहीं है। उन्होंने कहा कि भारत और फ्रांस के बीच व्यापक रणनीतिक साझेदारी है जिसमें राजनीतिक, रक्षा, सुरक्षा, आर्थिक, मानव केंद्रित विकास और स्थिरता सहयोग शामिल हैं। उन्होंने कहा कि जब समान दृष्टिकोण और मूल्यों वाले देश द्विपक्षीय रूप से, बहुपक्षीय व्यवस्था में या क्षेत्रीय संस्थानों में एक साथ काम करते हैं, तो वे किसी भी चुनौती से निपट सकते हैं। हिंद-प्रशांत क्षेत्र सहित हमारी साझेदारी किसी भी देश के खिलाफ या उसकी कीमत पर नहीं है। भारत और फ्रांस अपनी रणनीतिक साझेदारी की 25वीं वर्षगांठ मना रहे हैं और मोदी ने कहा कि दोनों देशों के बीच संबंध शानदार स्थिति में हैं। उन्होंने कहा कि यह मजबूत, भरोसेमंद और सुसंगत है। यह सबसे अंधेरे तूफानों में भी स्थिर और लचीला रहा है।