नई दिल्ली : पिछले कई महीनों से मणिपुर जल रहा है, हर तरफ तबाही, आगजनी, दंगे और अफरा-तफरी का माहौल है। कुकी और मैतेई समुदाय के लोगों के बीच एक विरोध प्रदर्शन से शुरू हुआ बवाल आज पूरे राज्य को आग में झोंक चुका है। अब तक इस दंगे में लगभग 160-170 लोगों की मौत हो चुकी है और कई लोग घायल हो चुके हैं। हर तरफ स्थानीय पुलिस और सुरक्षा बल के कर्मचारी भारी मात्रा में तैनात हैं, वहीं कई लोग आज भी अपने घरों से निकलने में डर रहे हैं। हालांकि, आपको बता दें, ऐसा पहली बार नहीं है। इससे पहले भी दो समुदायों के बीच रक्तपात हो चुका है, इससे पहले भी प्रदेश आग में जल चुका है और तबाही का मंजर देख चुका है। इस दंगे के बारे में आज भी बहुत-से लोग नहीं जानते हैं, जिसका बहुत बड़ा कारण था कि उस दौरान न तो इंटरनेट था और न ही कोई ऐसा समाचार चैनल था, जो 24 घंटे लोगों तक जानकारी पहुंचा सके।

इस खबर में हम आपको बताएंगे कि दंगों से मणिपुर का क्या कनेक्शन रहा है और इससे पहले कितनी बार राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू किया गया है। इससे पहले 1993 में नगा और कुकी समुदाय के लोगों के बीच भी काफी भीषण दंगा हुआ था, जिसमें सैकड़ों लोग मारे गए थे और माना जाता है कि अगर उस दौरान राष्ट्रपति शासन लागू नहीं किया गया होता, तो दंगे को संभालना थोड़ा मुश्किल हो सकता था। साल 1993 में मणिपुर हिंसा के दौरान राज्य में नगा और कुकी समुदाय आमने-सामने हुए थे। उस दौरान 10-20 और 50 नहीं, बल्कि सैकड़ों लोग मारे गए थे। कुछ आंकड़े बताते हैं कि लगभग 700 लोग, तो वहीं कुछ लोगों का कहना है कि इसमें अनगिनत लोग मारे गए थे। नगाओं और अल्पसंख्यक कुकी समुदाय के बीच संघर्ष इतना खूनी हो गया था कि इसमें बहुत कम समय में ही 85 लोगों की जान चली गई और पूरे के पूरे गांव जलाए जाने लगे। कुकी और नगा, दोनों ही ईसाई समुदाय के बीच जातीय शत्रुता जेनोफोबिक असुरक्षा से शुरू हुई थी। स्थानीय नगा इस बात से नाराज थे कि कुकी समुदाय के लोगों द्वारा उनकी भूमि पर अतिक्रमण कर लिया गया है।

दरअसल, नगा हमेशा से कुकी समुदाय के लोगों को विदेशी मानते थे। हालांकि, कुछ कुकी तब से मणिपुर में रह रहे हैं, जब उन्हें 18वीं शताब्दी में बर्मा के चिन हिल्स में अपनी मातृभूमि से बाहर निकाल दिया गया था। आज राज्य की 18 लाख की आबादी में 2.5 लाख कुकी समुदाय के लोग हैं, जबकि नगाओं की संख्या 4 लाख है। उस दौरान भड़की हिंसा में 28 गांव, जिनमें से दो-तिहाई नगा थे, वो पूरी नष्ट हो गए। चंदेल, सदर हिल्स और उरखुल जिलों में गांव के गांव तबाह हो गए और मलबे के ढेर में तब्दील हो गए। शरणार्थी शिविरों में रह रहे निवासियों को सुरक्षा के मद्देनजर खाली कर दिया गया। शरणार्थियों को एक जगह से दूसरी जगह ले जाना बहुत मुश्किल हो रहा था, क्योंकि जिस रास्ते से लेकर उन्हें गुजरना था, वो पूरी तरह से उग्रवादी इलाका माना जा रहा था। सड़क का यह हिस्सा प्रतिद्वंद्वी नेशनल सोशलिस्ट काउंसिल ऑफ नगालैंड (एनएससीएन-एम) और बर्मा स्थित कुकी नेशनल आर्मी (केएनए) के विद्रोहियों के नियंत्रण में था।

एक खुले मैदान में लगभग 300 नगा शरणार्थी को रखा गया था, क्योंकि कुकी विद्रोहियों द्वारा उनके गांवों पर किए गए हमले के बाद वे बेघर हो गए थे। पुरुष महिलाओं को उनके हाल पर छोड़कर जंगलों में भाग गए थे। लोगों में इस हद तक डर बैठा हुआ था कि जब सुरक्षा बल उनकी मदद के लिए गांव में पहुंचते थे, तो उस दौरान नगा परिवार के लोग अपनी झोपड़ी से बाहर नहीं निकलते थे, क्योंकि उन्हें लगता था ये कुकी समुदाय के लोग हैं और उनके झोपड़ी और परिवार को तहस-नहस कर देंगे। वहीं, दूसरी ओर कुकी गांव सीता में सब कुछ उल्टा था। घात लगाकर किए जाने वाले हमलों को रोकने के लिए सेना ने दोनों तरफ के जंगलों को साफ कर दिया और ग्रामीणों ने संभावित नगा हमलों के खिलाफ अस्थायी बैरिकेड्स लगा दिए थे। नगाओं ने इस गांव पर हमला किया और लगभग 25 झोपड़ियों में आग लगा दी। एनएससीएन (एम) के ग्रेटर नगालैंड के आह्वान से कुकियों की असुरक्षा की भावना बढ़ गई थी। नगा हमलों का मुकाबला करने के लिए कई कुकी महिलाओं ने हथियार उठा लिए थे।