नई दिल्ली : कुछ ही समय पहले विपक्ष ने केंद्र सरकार को महंगाई और बेरोजगारी के मुद्दे पर घेरना शुरू किया था। इसका असर भी जल्द ही सामने आ गया और सरकार को गैस मूल्यों में कटौती और महंगाई नियंत्रण के लिए विभिन्न उपाय करने पड़े। जगह-जगह पर रोजगार मेले लगाकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी जनता के बीच यह संकेत देने की कोशिश की कि सरकार युवाओं को नौकरी देने के मामले में गंभीर है और उन्हें रोजगार उपलब्ध करा रही है, लेकिन जैसे-जैसे चुनाव करीब आ रहे हैं, पूरा मामला एक बार फिर सनातन धर्म, हिंदुत्व, अगड़ा-पिछड़ा, दलित-आदिवासी जैसे जातिगत समीकरणों और देश का नाम भारत करने जैसे भावनात्मक मुद्दों में उलझता दिखाई पड़ रहा है। माना जा रहा है कि जनवरी में राम मंदिर का उद्घाटन, काशी-मथुरा-महाकाल का विकास और देश का नाम भारत करने जैसे मुद्दे जनता को आकर्षित करने के उद्देश्य से ही उठाए गए हैं।
नई संसद का गणेश चतुर्थी के दिन उद्घाटन औऱ जी 20 कार्यक्रम के मुख्य समारोह स्थल पर भगवान नटराज की मूर्ति स्थापित करना भी लोगों को आकर्षित करने की ही सोची-समझी योजना है। लेकिन ऐसा नहीं है कि केवल भाजपा या केंद्र सरकार ही इस सोची-समझी रणनीति पर आगे बढ़ रही है। भाजपा ने आरोप लगाया है कि विपक्षी दलों की ओर से सनातन धर्म और हिंदुओं का विरोध एक सोची-समझी रणनीति के तहत किया जा रहा है। यही कारण है कि कर्नाटक सरकार के मंत्री के तथाकथित सनातन विरोधी बयानों के बाद भी कांग्रेस नेतृत्व उस पर कोई सफाई नहीं दे रहा है। भाजपा की हिंदुत्व और राष्ट्रवाद की राजनीति के काट के तौर पर विपक्ष जातिगत जनगणना का मुद्दा उठाकर कुछ जातियों को अपने खेमे में लाने की कोशिश कर रहा है। जिस तरह सोनिया गांधी ने विशेष संसद सत्र में जातिगत गणना पर चर्चा कराने की मांग की है, वह भी इसी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है। इन परिस्थितियों में सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि क्या पूरा चुनाव अब इन्हीं भावनात्मक मुद्दों पर केंद्रित होगा और महंगाई-बेरोजगारी जैसे मुद्दे पीछे छूट जाएंगे? राजनीतिक विश्लेषक संजय तिवारी ने अमर उजाला से कहा कि भारतीय मतदाता भावनात्मक सोच और व्यक्तिवाद को बहुत गंभीरता से लेता है।
भौतिकवादी सोच की प्रधानता वाले पश्चिमी देशों के मतदाताओं से उलट हमारे मतदाता आध्यात्मिक सोच से प्रभावित होते हैं और वे नैतिक और भावनात्मक मुद्दों पर ज्यादा गंभीरता से प्रतिक्रिया देते हैं। ऐसा करने में वे कई बार अपने हानि-लाभ की चिंता भी नहीं करते। यदि हम यह देखते हैं कि उत्तर और दक्षिण भारत के कई राजनीतिक दल भयंकर भ्रष्टाचार करने के बाद भी एक वर्ग विशेष या कुछ जातियोंका वोट पा जाते हैं तो इसका मूल कारण यही है कि वे निजी हितों की तुलना में राजनीतिक दलों द्वारा प्रचारित तथाकथित जातीय हितों या अपने धर्म-संप्रदाय को प्रमुखता देते हैं।
स्वतंत्रता से लेकर आज तक के चुनावों में इसके सैकड़ों उदाहरण मिल जाएंगे। यही कारण है कि सभी राजनीतिक दल शुरुआती दौर में कुछ भी मुद्दे उठाएं, अंतिम समय में वे इन भावनात्मक मुद्दों को उठाने से नहीं चूकते। राजनीतिक विश्लेषक सुनील पांडेय ने अमर उजाला से कहा कि सभी मतदाताओं को एक ही कैटेगरी में नहीं रखा जा सकता। मतदाताओं में भी अलग-अलग वर्ग होते हैं और उन सबके लिए अपने-अपने मुद्दे ज्यादा प्रमुख होते हैं। चुनाव से संबंधित हुए अनेक सर्वे भी यह प्रमाणित करते हैं कि मतदाताओं की अलग-अलग प्राथमिकता होती है। महिलाओं, पुरुषों, अगड़ों-पिछड़ों, गरीब और अमीर सबको आकर्षित करने का मुद्दा एक नहीं हो सकता।