नई दिल्ली :नए संसद भवन में पहले दिन की कार्यवाही के दौरान महिला आरक्षण विधेयक पेश हो गया है। कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने इसे सदन के पटल पर रखा। बुधवार को इस विधेयक पर लोकसभा में चर्चा भी होनी है। लोकसभा में विधेयक पास होने के बाद गुरुवार को इसे राज्य में पेश किया जाएगा। गुरुवार को ही इस पर राज्यसभा में चर्चा भी हो सकती है।  हालांकि, इस तरह के विधेयक को पेश करने या पारित कराने का कोई पहला प्रयास नहीं है, बल्कि दशकों से इसी कोशिश हो रही है। लिहाजा हमें जानना चाहिए कि आखिर महिला आरक्षण का इतिहास क्या है? पहले कब-कब महिला आरक्षण विधेयक लाए गए? ये विधेयक क्यों पारित नहीं हुए? अब क्यों चर्चा में आया यह विधेयक? पिछले दो दशक से अधिक समय से शायद ही कोई संसद सत्र होगा, जिसमें महिला आरक्षण की  बात न उठी हो। पेश हुआ विधेयक संविधान संशोधन विधेयक है जिसे नारी शक्ति वंदन अधिनियम नाम दिया गया है। देश की संसद में महिला आरक्षण विधेयक पहली बार तो 1996 में पेश हुआ, लेकिन इसकी नींव 1992 में हुए 73वें और 74वें संविधान संशोधन द्वारा रखी जा चुकी थी। 27 साल के लंबे इंतजार के बाद संसद और विधानसभाओं में महिलाओं को 33 फीसदी आरक्षण देने का रास्ता साफ होने की स्थिति में है।

हालांकि, पहली बार इसे एचडी देवगौड़ा वाली संयुक्त मोर्चा सरकार ने 12 सितंबर 1996 को 81वां संविधान संशोधन विधेयक पेश किया। यह विधेयक तत्कालीन कानून मंत्री रमाकांत डी खलप द्वारा लोकसभा में पेश किया गया था, तब सत्तारूढ़ पक्ष में एक राय नहीं बन सकी थी। लालू प्रसाद, मुलायम सिंह यादव और शरद यादव समेत कई नेताओं ने संशोधन की मांग करते हुए इसका विरोध जताया। विधेयक को अंततः लोकसभा की तत्कालीन सदस्य गीता मुखर्जी की अध्यक्षता में एक संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) को भेज दिया गया। जेपीसी ने नौ दिसंबर 1996 को 11वीं लोकसभा में अपनी रिपोर्ट पेश की। बाद में इस विधेयक को 26 जून 1998 को अटल बिहारी वाजपेई के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार ने 84वें संविधान संशोधन विधेयक के रूप में 12वीं लोकसभा में फिर से पेश किया । 1998 में जब इस विधेयक को पेश करने के लिए तत्कालीन कानून मंत्री थंबी दुरै खड़े हुए थे। उस वक्त संसद में भारी हंगामा हुआ। यहां तक कि हाथापाई भी हुई। कुछ सांसदोंने उनके हाथ से विधेयक की प्रति को लेकर लोकसभा में ही फाड़ दिया था। जब मई 2004 में कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार सत्ता में आई, तो विधेयक को गठबंधन के न्यूनतम साझा कार्यक्रम में जगह मिली। इसमें कहा गया था कि यूपीए सरकार विधानसभाओं और लोकसभा में महिलाओं के लिए एक तिहाई आरक्षण के लिए कानून लाने का कदम उठाएगी। लेकिन यूपीए सरकार भी लोकसभा में विधेयक पास करने में विफल रही।

महिला आरक्षण के लिए संविधान संशोधन 108वां विधेयक 2008 में मनमोहन सिंह सरकार के कार्यकाल में 2008 में पेश हुआ था जो कि नौ मार्च 2010 को राज्यसभा में पारित हुआ, मगर लोकसभा में पारित नहीं हो पाया। उसके बाद 2014 में लोकसभा भंग हो गई। राज्यसभा से पास होने के बाद भी यह दोबारा लोकसभा से पास नहीं हो पाया। इसकी बड़ी वजह सपा, बसपा और आरजेडी का कड़ा विरोध और कोटे के भीतर कोटे की मांग थी, जिसके चलते ये विधेयक अधर में लटका गया। मनमोहन सरकार में कांग्रेस का अपना बहुमत नहीं था और कई समर्थक दल महिला आरक्षण विधेयक को मौजूदा रूप में पारित करने के लिए तैयार नहीं थे। लेकिन मौजूदा लोकसभा में न सिर्फ सत्ताधारी गठबंधन का बहुमत है, बल्कि सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी भी महिला आरक्षण के समर्थन में है। इसके अलावा बीआरएस और वामपंथी दल भी महिला आरक्षण लागू करना चाहते हैं। ऐसे में यह सरकार महिला आरक्षण के लिए संविधान संशोधन विधेयक ला रही है। इससे भारत में संसद और विधानसभाओं में महिलाओं का समुचित प्रतिनिधित्व संभव हो सकेगा।