गुवाहाटी : विभिन्न राजनीतिक समीकरणों के आधार पर मंगलवार को संसद में महिला संरक्षण विधेयक पेश किया गया। इस संदर्भ में असम में राजनीतिक दलों के बीच मिली-जुली प्रतिक्रिया देखी गई। लोकसभा और विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण का प्रस्ताव दिया गया है। तदनुसार, विधेयक के लागू होने के बाद असम विधानसभा में 126 सीटों में से 42 सीटें और 14 लोकसभा सीटों में से 4 सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित होंगी। लोकसभा और विधानसभा की ये सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित होने के बाद सत्तापक्ष और विपक्ष के कई नेताओं, मंत्रियों,विधायकों और सांसदों के सामने राजनीतिक अस्तित्व का संकट खड़ा हो जाएगा।
गौरतलब है कि राज्य में ऐसे कई विधायक हैं जो निर्वाचन क्षेत्रों के पुनर्निर्धारण के कारण अपना निर्वाचन क्षेत्र खो चुके हैं जिनमें सत्ता पक्ष के विधायक भी शामिल हैं। असम विधानसभा में फिलहाल 6 महिला विधायक हैं जिनमें से तीन सत्तारूढ़ भाजपा से, दो कांग्रेस की और एक भाजपा की सहयोगी एजीपी से हैं। गौरतलब है कि 2021 विधानसभा चुनाव में कुल 74 महिलाओं ने चुनाव लड़ा था। 2016 के विधानसभा में 8 महिला विधायक थीं जिनमें तीन कांग्रेस की, भाजपा और बीपीएफ की दो-दो और एजीपी की एक विधायक शामिल थीं। इससे पहले 2011 के विधानसभा चुनाव में 14 महिला उम्मीदवारों ने जीत हासिल की थी।
मंगलवार को लोकसभा में नारी शक्ति कानून पेश किया गया, लेकिन जब तक नई जनगणना के आधार पर देश भर में निर्वाचन क्षेत्रों को फिर से परिभाषित नहीं किया जाता तब तक इस विधेयक के लागू होने की संभावना नहीं है। इसका मतलब है कि बिल को लागू होने के लिए 2029 के लोकसभा चुनाव तक इंतजार करना पड़ सकता है। यह मुद्दा कई लोगों के लिए आशा लेकर आया है। कारण कि भविष्य में अपने निर्वाचन क्षेत्र हारने वाले राजनीतिक नेताओं की सीटें कम से कम 2029 तक सुरक्षित रहेंगी। जब से मोदी सरकार ने संसद में विधेयक पेश किया है, सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों खेमों ने निर्वाचन क्षेत्र-केंद्रित समीकरण और गणना शुरू कर दी है। यह अभी तक स्पष्ट नहीं है कि किन विधायकों या सांसदों को अपना निर्वाचन क्षेत्र महिलाओं के लिए छोड़ना पड़ेगा। हालाकि, यदि देशव्यापी निर्वाचन क्षेत्र के पुनर्निर्धारण में असम में लोकसभा और विधानसभा सीटों की संख्या बढ़ती है, तो महिला उम्मीदवारों की संख्या भी तदनुसार बढ़ जाएगी।