एजल : मिजोरम कई वर्षों के उग्रवाद के बाद 1987 में अलग राज्य बना था और तब से यहां या तो मिजो नेशनल फ्रंट (एमएनएफ) की सरकार रही है या कांग्रेस की। नए राजनीतिक दल जोरम पीपुल्स मूवमेंट (जेडपीएम) के उभरने से हालांकि इस पूर्वोत्तर राज्य में राजनीतिक समीकरण बदल सकता है। मिजोरम में सभी 40 विधानसभा सीटों के लिए मतदान सात नवंबर को होगा। निर्वाचन आयोग ने सोमवार को इसकी घोषणा की। मुख्यमंत्री जोरमथांगा की अगुवाई वाला सत्तारूढ़ एमएनएफ 2023 के विधानसभा चुनाव में लगातार दूसरी बार सत्ता में आने के लिए प्रयासरत है। तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी द्वारा 1987 में मिजो शांति समझौते पर हस्ताक्षर करने के बाद मिजोरम राज्य अस्तित्व में आया।
राज्य बनने के बाद से एमएनएफ ने तीन बार राज्य में शासन किया है, जबकि इसकी प्रमुख प्रतिद्वंद्वी कांग्रेस चार बार सत्ता में रही है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि जोरमथांगा नीत पार्टी को राज्य की महत्वाकांक्षी ‘सामाजिक-आर्थिक विकास नीति’ (एसईडीपी) के तहत वित्तीय सहायता के वितरण, म्यामां, बांग्लादेश और मणिपुर से आए शरणार्थियों तथा विस्थापित लोगों को संभालने के तरीके के कारण प्रतिद्वंद्वियों पर बढ़त मिल सकती है। मिजोरम विश्वविद्यालय में राजनीतिक विज्ञान विभाग के प्रोफेसर जे. डॉन्गेल ने कहा कि एमएनएफ को शरणार्थियों के मुद्दे, खासकर मणिपुर के विस्थापितों के मुद्दे को संभालने के तरीके से लाभ मिलेगा।
उन्होंने कहा कि विपक्षी दलों के पास भी विस्थापितों से निपटने के मुख्यमंत्री जोरमथांगा के तरीके की आलोचना करने के लिए कोई तर्क नहीं है। वर्ष 2018 के विधानसभा चुनाव में एमएनएफ ने 37.7 प्रतिशत वोट हासिल किए थे और 26 सीटों पर जीत दर्ज करके कांग्रेस सरकार को हटा दिया था। उस चुनाव में कांग्रेस सिर्फ पांच सीटें ही जीत पाई, हालांकि उसे करीब 30 फीसदी वोट मिले थे। कांग्रेस पार्टी अपने नए प्रदेश अध्यक्ष लालसावता के नेतृत्व में पार्टी के अंदर बदलाव लाने और युवाओं को अधिक से अधिक जोड़ने पर जोर दे रही है।