पूर्वांचल प्रहरी कार्यालय संवाददाता शिलांग : आज जिस सच्चाई से हम पर्दा उठाने जा रहे हैं उसे सुनकर केवल देश का लोकतंत्र ही नहीं, बल्कि मानवता भी शर्मिंदा होगी। मेघालय के गारो पहाड़ी जिले का बाघमारा क्षेत्र, जो बिलकुल बांग्लादेश बॉर्डर से लगा हुआ भारतीय गांव है। यहां पर ईसाई आदिवासी बहुसंख्यक आबादी रहती है और उनके अलावा यहां पर साढ़े पांच हजार के आसपास हिन्दू आबादी भी है,जो बांग्लादेश  की स्थापना के पहले से यहां रहते आ रहे हैं, परंतु अब धीरे-धीरे वह पलायन करने को मजबूर हो चुके हैं, क्योंकि इनके लिए यहां आगे कुआं पीछे खाई वाली समस्या खड़ी है। यहां पर हिन्दू समाज के लोगों की मृत्यु हो जाने पर उनके दाह संस्कार के लिए भूमि तक उपलब्ध नहीं है। हालात ऐसे हैं कि अगर किसी की मृत्यु हो जाती है तो हिंदू समाज के लोगों को रात होने का इंतजार करना पड़ता है, ताकि वे शव का चोरी छिपे दाह संस्कार कर सकें।

ऐसा इसलिए कि पहले जो हिन्दुओं का श्मशान घाट था अब वह भूमि बांग्लादेश के हिस्से में चली गई है, जिस पर बांग्लादेश की तरफ से एक सड़क का निर्माण हो चुका है। वहीं दूसरे तरफ यहां भारतीय क्षेत्र में हिन्दुओं को श्मशान के लिए भूमि उपलब्ध नहीं हो पा रही है, क्योंकि यहां के  ईसाई आदिवासी बहुसंख्यक इसका विरोध कर रहे हैं, जिसके कारण राज्य प्रशासन हिन्दुओं को श्मशान  के लिए भूमि नहीं दे पा रहा है। यहां के स्थानीय लोग उन्हें कहते हैं कि शव को दफनाना होगा तो हम तुम्हें भूमि देंगे, मगर जलाने के लिए नहीं, क्योंकि इससे प्रदूषण होगा। थक-हार कर अब यहां के हिन्दुओं को अब सिमसंग  नदी के किनारे, जो हिस्सा बांग्लादेश में पड़ता है चोरी-छिपे शव का दाह संस्कार करना पड़ता है, वहीं बांग्लादेश भी उन्हें इसकी अनुमति नहीं देता कि वे बांग्लादेश की भूमि पर दाह संस्कार करें।